आंकड़ों के अनुसार इस अवधि में पुलिस ने संगठित अपराध, गिरोहबंदी और गंभीर आपराधिक गतिविधियों पर लगातार कार्रवाई की है। हजारों मामलों में पुलिस और अपराधियों के बीच टकराव की स्थिति बनी, जिसमें बड़ी संख्या में लोगों को गिरफ्तार किया गया। साथ ही कई अपराधी घायल भी हुए, जिससे यह संकेत मिलता है कि कानून-व्यवस्था को लेकर राज्य में सक्रिय और आक्रामक रणनीति अपनाई गई है। इन कार्रवाइयों के दौरान पुलिस बल को भी नुकसान हुआ, जिसमें कुछ कर्मियों की जान जाने और कई के घायल होने की घटनाएं शामिल रहीं।
प्रदेश के विभिन्न जोनों में इन कार्रवाइयों का स्तर अलग-अलग रहा। कुछ क्षेत्रों में मुठभेड़ों की संख्या अधिक दर्ज की गई, जबकि कुछ जगहों पर तुलनात्मक रूप से कम घटनाएं सामने आईं। पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कई जोन इस तरह की कार्रवाइयों में अधिक सक्रिय दिखाई दिए, जहां अपराधियों पर लगातार दबाव बनाए रखने के प्रयास किए गए। इन अभियानों में बड़े अपराधियों को पकड़ने और उनकी गतिविधियों को रोकने पर विशेष जोर दिया गया।
इन आंकड़ों के साथ यह भी दावा किया जा रहा है कि पुलिस की सख्ती के चलते संगठित अपराध पर नियंत्रण में मदद मिली है और कई आपराधिक नेटवर्क प्रदेश छोड़ने या निष्क्रिय होने को मजबूर हुए हैं। प्रशासन का कहना है कि कठोर कार्रवाई और कानूनी प्रावधानों के प्रभावी उपयोग से अपराधियों में भय का माहौल बना है। वहीं दूसरी ओर, इस तरह की कार्रवाइयों को लेकर समय-समय पर मानवाधिकार और पुलिसिंग के तरीकों पर सवाल भी उठते रहे हैं, जिससे यह मुद्दा केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित न रहकर सामाजिक और कानूनी बहस का हिस्सा बन गया है।
कुल मिलाकर, पिछले नौ वर्षों में सामने आए ये आंकड़े उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था को लेकर एक व्यापक तस्वीर पेश करते हैं, जिसमें एक तरफ अपराध पर नियंत्रण और पुलिस की सक्रिय भूमिका दिखाई देती है, तो दूसरी तरफ इस रणनीति की प्रकृति और प्रभाव पर अलग-अलग राय भी मौजूद हैं। यह पूरा विषय राज्य में सुरक्षा व्यवस्था के बदलते स्वरूप और उसके परिणामों को समझने के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
