नई दिल्ली। चुनाव आयोग ( Election Commission) ने सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) में अपने कामकाज और फैसले लेने की प्रक्रिया का बचाव किया है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची (Electoral Roll) के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special In-depth Review- SIR) से जुड़े प्रमुख फैसले सामूहिक रूप से लिए गए थे। आयोग के तीनों सदस्यों ने हलफनामा दाखिल करने को भी सर्वसम्मति से मंजूरी दी।
हालांकि, आयोग के इस जवाब से उसके कामकाज को लेकर उठे सभी सवालों का समाधान नहीं हुआ है। चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में 14 बार अपनी टिप्पणियां दर्ज की थीं। इनमें कई मामलों में उन्होंने फैसले लिए जाने के बाद इसकी जानकारी मिलने की बात कही थी। यही इस पूरे विवाद का अहम पहलू है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि आयोग ने आखिरकार किसी फैसले को मंजूरी दी या नहीं, बल्कि यह भी है कि क्या उसके दोनों अन्य सदस्यों को आयोग के नाम पर की जा रही कार्रवाई की जानकारी और उसमें अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिला। आरोप ये लग रहे हैं कि सभी फैसले ज्ञानेश कुमार खुद ले रहे थे।
फॉर्म 6 में बदलाव को लेकर क्या विवाद है?
एक रिपोर्ट के मुताबिक, मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म 6 को लेकर भी आयोग के हलफनामे में सफाई दी गई है। मई में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि मतदाता पंजीकरण के लिए निर्धारित फॉर्म 6 में बदलाव करने के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम, 1960 में संशोधन जरूरी है। सुखबीर सिंह संधू ने भी इस बात से सहमति जताई थी।
इसके बावजूद जुलाई में फॉर्म 6 के ऑनलाइन वर्जन में बदलाव दिखाई दिया। संधू को इसकी जानकारी एक अखबार की रिपोर्ट से मिली। अगस्त में उन्होंने ऑनलाइन फॉर्म में जोड़ी गई घोषणा को अनधिकृत और अवैध बताया था।
अब आयोग ने हलफनामे में कहा है कि SIR के दौरान जोड़ी गई घोषणा फॉर्म 6 में संशोधन नहीं थी, बल्कि एक अलग दस्तावेज था। हालांकि, आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन में घोषणा को जिस तरह दिखाया गया, उससे ऐसा लग सकता था कि फॉर्म 6 में बदलाव किया गया है।
आयोग ने माना कि अधिकारियों की ओर से उठाए गए कुछ कदमों में सुधार की जरूरत थी। इसके बाद आयोग के निर्वाचन रजिस्ट्रीकरण प्रभाग ने 21 अक्टूबर को ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया में वैधानिक फॉर्म 6 और SIR से जुड़ी घोषणा को अलग-अलग करने का फैसला लिया।
लेकिन हलफनामे में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि जुलाई में ऑनलाइन फॉर्म में घोषणा जोड़ने की मंजूरी किसने दी थी। यह भी नहीं बताया गया कि दो चुनाव आयुक्तों की ओर से इस संबंध में लिखित आपत्तियां दर्ज किए जाने के बावजूद यह बदलाव कैसे लागू हुआ।
ECINet के कामकाज पर भी उठे सवाल
चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINet को लेकर भी सवाल उठाए गए थे। इस प्लेटफॉर्म के जरिये मतदाता सूची से जुड़े कई काम किए जाते हैं। हलफनामे में आयोग ने कहा कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें बदलाव करने की वैधानिक जिम्मेदारी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी (ERO) की होती है। आयोग के मुताबिक, ERO के आदेश के बिना किसी मतदाता का नाम जोड़ा, हटाया या संशोधित नहीं किया जाता। सॉफ्टवेयर का उद्देश्य अधिकारियों को उनके अधिकारों का इस्तेमाल करने में मदद करना है।
आयोग ने प्लेटफॉर्म की कानूनी अनुपालन प्रक्रिया की समीक्षा और नए आईटी मॉड्यूल की जांच के लिए भी नई व्यवस्था का उल्लेख किया। इसके तहत आईआईटी मुंबई और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के विशेषज्ञों वाली समिति का प्रावधान किया गया है।
हालांकि, रिपोर्ट के मुताबिक, ऐसी ही व्यवस्था का सुझाव विवेक जोशी ने 29 मई को दिया था। उन्होंने मतदाता सूची के डेटाबेस में अधिकारों के धीरे-धीरे केंद्रीकरण को लेकर चिंता जताई थी। उन्होंने सुझाव दिया था कि आईआईटी के किसी बाहरी विशेषज्ञ की मदद से यह प्रमाणित कराया जाए कि डेटाबेस में बदलाव करने का अधिकार केवल संबंधित वैधानिक अधिकारियों के पास हो।
सुखबीर सिंह संधू ने भी जुलाई में इस सुझाव का समर्थन किया था। लेकिन 14 अगस्त को दर्ज अपनी टिप्पणी में संधू ने कहा था कि उनके पहले के सुझावों पर क्या हुआ, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है। आयोग के हलफनामे में समिति बनाने के फैसले का जिक्र है, लेकिन मई में दिए गए इस सुझाव का उल्लेख नहीं किया गया है।
गोवा में 97 मतदाताओं के नाम का मामला
गोवा में मतदाता सूची से जुड़े मामले का भी हलफनामे में उल्लेख है। आयोग के अनुसार, अंतिम मतदाता सूची से बाहर रह गए 97 मतदाताओं में से 88 ने बाद में फॉर्म 6 के जरिए आवेदन किया। हालांकि, इससे पहले फरवरी में सामने आई समस्या का स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया। रिपोर्ट के मुताबिक, गोवा के निर्वाचन अधिकारियों ने सात दिनों के भीतर आठ बार सॉफ्टवेयर में जरूरी बदलाव करने का अनुरोध किया था, ताकि हटाए गए मतदाताओं के नाम बहाल करने के उनके फैसलों को लागू किया जा सके।
आयोग के एक उप निर्वाचन आयुक्त ने भी टिप्पणी की थी कि आईटी सिस्टम जरूरी कार्रवाई को नहीं रोक सकता। हलफनामे में बाद में 88 मतदाताओं के आवेदन करने की जानकारी तो दी गई, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि फरवरी में अधिकारियों को अपने फैसले लागू करने में परेशानी क्यों हुई थी।
पश्चिम बंगाल में अपीलों को लेकर भी सवाल
पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची में नाम बहाल करने के आदेशों के खिलाफ दाखिल अपीलों का मामला भी हलफनामे में उठाया गया है। आयोग ने कहा कि ये अपीलें राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय के अधिकारियों ने दाखिल की थीं और इस मामले को आयोग के सामने नहीं लाया गया था। आयोग ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत संबंधित अधिकारियों को अपील दाखिल करने का अधिकार था। हालांकि, इस मामले में भी कुछ सवाल बिना जवाब के ही रहे।
