यह याचिका भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के महासचिव और पूर्व राज्यसभा सांसद एमए बेबी ने दाखिल की थी। इसमें मेट्रो स्टेशनों को बंद करने और दिल्ली के प्रमुख रेलवे स्टेशनों पर कुछ ट्रेनों को रद्द करने के फैसले को चुनौती दी गई। याचिका के अनुसार, दिल्ली पुलिस ने 8 अक्टूबर को दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन को पत्र लिखकर 57 मेट्रो स्टेशनों के प्रवेश और निकास द्वार बंद करने को कहा था। यह व्यवस्था 9 अक्टूबर की रात 9 बजे से लागू किए जाने और हालात सामान्य होने तक जारी रखने की बात कही गई थी। याचिका में कहा गया कि इस कदम का असर केवल प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों पर नहीं, बल्कि रोजाना काम, पढ़ाई, इलाज और अन्य जरूरी कामों के लिए यात्रा करने वाले नागरिकों पर भी पड़ सकता है।
याचिका में जिन स्टेशनों का उल्लेख किया गया, उनमें सुप्रीम कोर्ट, हौज खास, लाजपत नगर, कश्मीरी गेट, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, शाहदरा और रोहिणी सहित कई स्टेशन शामिल बताए गए। याचिकाकर्ता का कहना था कि इनमें से कई स्टेशन अस्पतालों, कॉलेजों, अदालतों और रिहायशी इलाकों तक पहुंचने के लिए महत्वपूर्ण हैं। याचिका में 10 अक्टूबर को नई दिल्ली और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशनों पर सुबह 4 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच पहुंचने वाली कई मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों को रद्द करने पर भी सवाल उठाया गया। इनमें हावड़ा-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस और सियालदह-नई दिल्ली राजधानी एक्सप्रेस का जिक्र किया गया। याचिका में मरीजों, विद्यार्थियों, यात्रियों और दूसरे नागरिकों को संभावित परेशानी का मुद्दा उठाया गया। साथ ही, दावा किया गया कि प्रदर्शन में शामिल होने के लिए दिल्ली आ रहे कुछ लोगों को दूसरे राज्यों में रोका गया या हिरासत में लिया गया।
याचिकाकर्ता ने अदालत से मेट्रो स्टेशनों को बंद करने का फैसला रोकने, सेवाएं सामान्य करने और रद्द ट्रेनों को जहां तक संभव हो दोबारा चलाने का निर्देश देने की मांग की थी। प्रभावित यात्रियों को पूरा रिफंड और वैकल्पिक यात्रा व्यवस्था उपलब्ध कराने की मांग भी की गई। याचिका में जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति देने और प्रदर्शन में शामिल होने के लिए दिल्ली आने वाले लोगों को केवल इसी कारण रोकने से बचने का अनुरोध किया गया। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मेट्रो सेवाओं पर पाबंदियों से लाखों लोगों की रोजमर्रा की आवाजाही प्रभावित हो सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि वकीलों के पास निजी वाहन हो सकते हैं, लेकिन अदालतों में काम करने वाले कई कर्मचारी मेट्रो से आते हैं। पीठ ने अधिकारियों से बैरिकेडिंग की जानकारी सार्वजनिक करने और लोगों को वैकल्पिक सड़कों के बारे में बताने की जरूरत पर भी जोर दिया।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि सरकार लोगों को होने वाली असुविधा के मुद्दे पर संबंधित अधिकारियों से चर्चा करेगी। उन्होंने दलील दी कि सुरक्षा संबंधी कदम सभी की सुरक्षा को ध्यान में रखकर उठाए जा रहे हैं। उन्होंने पिछली एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा कि 20 जून को प्रदर्शन की एक दिन की अनुमति मांगी गई थी, लेकिन प्रदर्शन 17 दिनों तक चला और संसद की ओर जाने की कोशिश भी हुई। उनके अनुसार, उस दौरान 200 से अधिक पुलिसकर्मी घायल हुए थे। उन्होंने यह भी कहा कि इंटरनेट पर पाबंदी सीमित क्षेत्र में है और महिला पुलिसकर्मियों के साथ दुर्व्यवहार की घटनाएं हुई थीं। अदालत ने प्रदर्शन की अनुमति के सवाल पर विचार करने से इनकार करते हुए सार्वजनिक परिवहन और नागरिकों की परेशानी पर ध्यान केंद्रित रखा।
सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने जंतर-मंतर की भौगोलिक स्थिति और सीमित जगह को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जगह की कमी के कारण प्रदर्शनकारियों के लिए भोजन, स्वच्छता और एंबुलेंस जैसी व्यवस्थाओं में समस्याएं पैदा हो सकती हैं और उनके अधिकार भी प्रभावित हो सकते हैं। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि मेट्रो, ट्रेन और सड़क परिवहन को पूरी तरह बंद नहीं किया जा सकता तथा कदम हालात के अनुरूप होने चाहिए। अदालत ने लोगों को यह स्पष्ट जानकारी देने की जरूरत बताई कि कौन-सी सेवाएं कब उपलब्ध होंगी और किन रास्तों का इस्तेमाल किया जा सकता है। केंद्र की ओर से आश्वासन दिया गया कि अधिकारियों से बातचीत के बाद संतुलित कदम उठाए जाएंगे, यातायात का प्रवाह बनाए रखने की कोशिश होगी और लोगों की सुविधा के लिए सलाह जारी की जाएगी।
