उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि एक लेखक के तौर पर उनके सामने जो सामग्री आई है, वह अंतिम संस्करण नहीं है। ऐसे में जो कॉपी सार्वजनिक रूप से प्रसारित की जा रही है, उसकी प्रमाणिकता पर वह कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। उनका कहना है कि बिना अंतिम रूप देखे किसी भी सामग्री को आधिकारिक मानना सही नहीं होगा।
इस पूरे मामले में एक और अहम बात यह सामने आई है कि प्रकाशन से जुड़ी प्रक्रिया अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। प्रकाशक की ओर से भी पहले यह कहा गया था कि पुस्तक का कोई आधिकारिक और अंतिम संस्करण अभी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। इसी वजह से अलग-अलग माध्यमों में जो अंश सामने आए हैं, उन्हें अंतिम सत्य मानना उचित नहीं माना जा सकता।
विवाद की जड़ में किताब का एक कथित अंश रहा, जिसमें एक पंक्ति को लेकर अलग-अलग तरह की व्याख्याएं की जाने लगीं। इस पंक्ति को कुछ लोगों ने राजनीतिक संदर्भ में जोड़कर देखा, जिससे इस पर बहस और तेज हो गई। हालांकि पूर्व सेना प्रमुख ने इस पर साफ किया कि किताब में किसी भी स्थान पर किसी विशेष व्यक्ति का नाम नहीं लिया गया है।
उन्होंने यह भी कहा कि सेना में ऑपरेशन के दौरान निर्णय लेने की प्रक्रिया में जिम्मेदारी और भरोसे का संतुलन होता है, जिसे गलत तरीके से नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, किसी भी कथन या विचार को उसके मूल संदर्भ में समझना जरूरी होता है, न कि उसे तोड़-मरोड़कर अलग अर्थ देना।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि अक्सर किसी भी विषय को अलग-अलग नजरिए से देखा जाता है, लेकिन हर बात को विवाद या राजनीतिक बहस का हिस्सा बनाना सही नहीं है। उनका मानना है कि किसी भी लेखन को उसके पूरे संदर्भ और वास्तविक उद्देश्य के साथ ही समझा जाना चाहिए।
