कासेम सिद्दीकी की वापसी ऐसे समय हुई है जब विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस में आंतरिक मतभेद सामने आए हैं। पार्टी के कई विधायकों ने ममता बनर्जी के नेतृत्व पर सवाल उठाते हुए अलग गुट का रुख किया था। इस गुट के साथ बड़ी संख्या में विधायक जुड़े थे और पार्टी नेतृत्व के खिलाफ राजनीतिक मोर्चा खोलने की कोशिश हुई थी।
सिद्दीकी भी कुछ समय के लिए इसी बागी गुट के साथ थे। हालांकि अब उन्होंने वहां से अलग होकर ममता बनर्जी के साथ बने रहने का फैसला किया है। उन्होंने अपने निर्णय के पीछे की वजह बताते हुए कहा कि उन्हें बागी गुट के उद्देश्य को लेकर अलग जानकारी दी गई थी।
सिद्दीकी के अनुसार, उन्हें बताया गया था कि कुछ दस्तावेजों पर हस्ताक्षर लिए जा रहे हैं और ये दस्तावेज ममता बनर्जी तक पहुंचाए जाएंगे। उन्हें यह भी बताया गया था कि बागी गुट ममता बनर्जी के नेतृत्व में ही काम करेगा। लेकिन बाद में जब उन्होंने गुट की गतिविधियों को देखा तो उन्हें वहां तृणमूल कांग्रेस प्रमुख के नेतृत्व या भूमिका का स्पष्ट उल्लेख दिखाई नहीं दिया।
इसके बाद उन्होंने बागी गुट से अलग होने का फैसला किया। सिद्दीकी ने कहा कि उन्हें ममता बनर्जी ने टिकट दिया और उनके नेतृत्व में ही वह विधानसभा तक पहुंचे। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव के दौरान उन्होंने ममता बनर्जी की तस्वीर के साथ लोगों के बीच जाकर समर्थन मांगा था और मतदाताओं ने भी उनके नेतृत्व को ध्यान में रखते हुए उन्हें समर्थन दिया।
कासेम सिद्दीकी का राजनीतिक प्रभाव केवल उनके विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं माना जाता। उनका संबंध हुगली जिले के फुरफुरा शरीफ से जुड़े धार्मिक और सामाजिक प्रभाव वाले समुदाय से है। मुस्लिम समुदाय के बीच उनकी पकड़ को देखते हुए उनकी राजनीतिक स्थिति तृणमूल कांग्रेस के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। पिछले साल पार्टी में शामिल होने के बाद उन्हें संगठन में राज्य महासचिव की जिम्मेदारी भी दी गई थी।
इसके बाद विधानसभा चुनाव में उन्हें आमडांगा सीट से उम्मीदवार बनाया गया और उन्होंने जीत दर्ज की। अब उनका ममता बनर्जी के खेमे में लौटना पार्टी के भीतर चल रही गुटबाजी के बीच महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।
हालांकि कासेम सिद्दीकी की वापसी के बावजूद तृणमूल कांग्रेस में अंदरूनी विवाद पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। पार्टी के दोनों पक्षों के बीच संगठनात्मक गतिविधियों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। तृणमूल छात्र परिषद के स्थापना दिवस को लेकर भी दोनों गुटों की ओर से अलग-अलग तैयारियां की जा रही हैं।
28 अगस्त को मेयो रोड पर गांधी प्रतिमा के पास छात्र परिषद का स्थापना दिवस मनाने को लेकर विवाद सामने आया है। दोनों पक्षों ने कार्यक्रम की अनुमति के लिए अदालत का रुख किया है। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाला खेमे पारंपरिक स्थान पर कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति चाहता है।
ऐसे समय में कासेम सिद्दीकी की वापसी को पार्टी नेतृत्व के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उनकी वापसी यह संकेत देती है कि बागी खेमे के भीतर भी सभी विधायक एकजुट नहीं हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर चल रही गुटबाजी किस दिशा में जाती है और कितने अन्य नेता या विधायक ममता बनर्जी के नेतृत्व में वापस आते हैं।
