अध्यक्ष पद पर ABVP के यश डबास ने जीत दर्ज की। उन्हें 24,576 वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी NSUI के विजय शंकर मीणा को 22,523 वोट मिले। इस तरह डबास ने 2,053 वोटों के अंतर से अध्यक्ष पद अपने नाम किया। सचिव पद पर ABVP की रिया छावड़ी विजयी रहीं, जबकि संयुक्त सचिव पद पर लक्ष्य राज सिंह ने जीत दर्ज की।
उपाध्यक्ष पद का परिणाम हालांकि बाकी तीन पदों से अलग रहा। इस सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने 30,615 वोट हासिल कर जीत दर्ज की। ABVP के ईशु मौर्या को 16,910 वोट मिले, जबकि NSUI के वीर छत्रथ को 4,313 वोट प्राप्त हुए। शौकीन पहले NSUI से जुड़े रहे हैं और इस बार उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा।
चुनाव में कुल मतदान प्रतिशत 40.46 रहा। चार केंद्रीय पदों के लिए हुए मुकाबले में ABVP ने तीन सीटों पर जीत हासिल की, जबकि NSUI किसी भी केंद्रीय पद पर जीत दर्ज नहीं कर सकी। वर्ष 2015 के बाद यह पहली बार है जब NSUI चार प्रमुख पदों में से कोई भी पद हासिल नहीं कर पाई है।
नतीजों के बाद कांग्रेस नेता और राज्यसभा सांसद राजीव शुक्ला ने चुनाव को लेकर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि विपक्ष से जुड़े छात्र संगठनों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। उनके अनुसार, अगर ये संगठन एक साथ चुनाव मैदान में उतरते तो परिणाम अलग हो सकता था और इंडिया गठबंधन से जुड़े पक्ष को अधिक सफलता मिल सकती थी।
राजीव शुक्ला की प्रतिक्रिया के बाद DUSU चुनाव के नतीजों को लेकर राजनीतिक चर्चा का एक और पहलू सामने आया। उनके बयान का आधार यह था कि अलग-अलग उम्मीदवारों के मैदान में होने से संबंधित वोटों का बंटवारा हुआ और इसका चुनावी परिणाम पर असर पड़ा।
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव को छात्र राजनीति में महत्वपूर्ण माना जाता है। विश्वविद्यालय के केंद्रीय पैनल के चुनाव में अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव जैसे पदों के लिए मुकाबला होता है। इन चुनावों में छात्र मुद्दों के साथ विभिन्न छात्र संगठनों की राजनीतिक सक्रियता भी दिखाई देती है।
इस बार चुनाव के दौरान छात्रों से जुड़े कई मुद्दे चर्चा में रहे। इनमें हॉस्टल, पीजी व्यवस्था और सुरक्षा जैसे विषय प्रमुख रहे। चुनाव परिणामों ने एक ओर ABVP को तीन केंद्रीय पद दिए, वहीं उपाध्यक्ष पद पर निर्दलीय उम्मीदवार की जीत ने अलग तस्वीर पेश की।
इस परिणाम के बाद छात्र संगठनों के बीच रणनीति और चुनावी तालमेल को लेकर चर्चा होना स्वाभाविक है। हालांकि अलग-अलग संगठनों के प्रदर्शन और वोटों के बंटवारे को लेकर राजनीतिक नेताओं की व्याख्या उनके अपने आकलन पर आधारित है। DUSU के ताजा परिणामों ने दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति में अलग-अलग संगठनों की स्थिति को एक बार फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
