नवोदय विद्यालय से रिटायर्ड लेक्चरर अशोक कुमार दुबे ने वर्ष 2018 में पक्षियों को दाना खिलाने की शुरुआत की थी। उस समय उनके घर के आसपास केवल पांच से सात चिड़ियां भोजन के लिए आती थीं। धीरे धीरे इस सिलसिले में कौवे भी जुड़ते गए। शुरुआत में उनकी संख्या बेहद कम थी लेकिन समय के साथ यह संख्या बढ़ती चली गई। 10 से 20 और फिर 50 कौवों से शुरू हुआ यह सिलसिला अब सैकड़ों तक पहुंच चुका है। मौसम के अनुसार संख्या में उतार चढ़ाव जरूर होता है लेकिन जुलाई अगस्त और सितंबर के दौरान कौवों की मौजूदगी काफी बढ़ जाती है।
अशोक दुबे के घर शाम करीब छह बजे जैसे ही भोजन रखने का समय होता है आसपास उड़ते कौवे उनकी आवाज पहचानकर पहुंचने लगते हैं। देखते ही देखते घर के आसपास कौवों का बड़ा झुंड दिखाई देने लगता है। दाना और पानी लेने के बाद ये पक्षी अंधेरा होने से पहले अपने ठिकानों की ओर लौट जाते हैं। फिलहाल रोज करीब 500 से 700 कौवे यहां पहुंच रहे हैं और कुछ दिनों में यह संख्या 1000 के आसपास भी पहुंच जाती है।
इतने बड़े झुंड के भोजन का इंतजाम भी कम नहीं है। रोज करीब 10 किलो चावल और दो किलो परमल कौवों के लिए रखा जाता है। इस सेवा पर प्रतिदिन करीब 800 से 1000 रुपये तक खर्च होने की बात बताई गई है। सालभर में यह खर्च करीब दो लाख रुपये तक पहुंच जाता है। हालांकि अब कॉलोनी के कुछ लोग भी इस पहल से जुड़ चुके हैं। शंकर राव जांगड़े और जयसिंह सहित अन्य लोग कौवों के लिए पानी की व्यवस्था में सहयोग करते हैं। इस तरह दाना और पानी की यह सेवा केवल एक व्यक्ति की जिम्मेदारी न रहकर सामूहिक प्रयास का रूप ले चुकी है।
श्राद्ध पक्ष में कौवों के लिए भोजन का स्वरूप भी बदल जाता है। इन दिनों उन्हें खीर पूड़ी भजिए और मीठी नुक्ती खिलाई जाती है। अशोक दुबे के अनुसार खीर और पूड़ी देखते ही कौवे तेजी से पहुंचते हैं और भोजन कुछ ही समय में खत्म हो जाता है। ज्यादा से ज्यादा कौवों तक भोजन पहुंच सके इसके लिए पूड़ी को छोटे टुकड़ों में बांटकर खिलाया जाता है।
हिंदू परंपराओं में श्राद्ध के दौरान कौवे को भोजन कराने की विशेष मान्यता बताई जाती है। धार्मिक विश्वास के अनुसार कौवे को दिया गया भोजन पितरों तक पहुंचने से जोड़ा जाता है। पंचबलि की परंपरा में भी कौवे को भोजन अर्पित करने का उल्लेख मिलता है। उज्जैन जैसे धार्मिक शहर में सिद्धवट और रामघाट समेत विभिन्न स्थानों पर श्राद्ध कर्म के लिए आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह परंपरा खास महत्व रखती है।
अशोक दुबे के लिए हालांकि यह सेवा केवल धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक लगातार दाना पानी मिलने के कारण कौवों को इस जगह पर भरोसा हो गया है। आठ साल पहले शुरू हुई छोटी सी पहल आज सैकड़ों पक्षियों के लिए रोज के भोजन का सहारा बन गई है। त्रिवेणी हिल्स में शाम होते ही कौवों का यह जमावड़ा बताता है कि नियमित दाना पानी और सुरक्षित माहौल मिलने पर पक्षी भी किसी जगह को अपने भरोसेमंद ठिकाने के रूप में अपना सकते हैं।
