जानकारी के अनुसार, जिले में चना और मसूर की खरीदी मार्कफेड द्वारा की जा रही है, जबकि उपार्जन की जिम्मेदारी सेवा सहकारी संस्थाओं को सौंपी गई है। इन संस्थाओं ने निर्धारित गुणवत्ता मानकों की अनदेखी करते हुए भारी मात्रा में अमानक मसूर की खरीद कर ली। मानक के अनुसार उपज में अधिकतम 2 प्रतिशत तक ही कचरा और मिट्टी की अनुमति है, लेकिन जांच में 2.50 प्रतिशत से लेकर 5.50 प्रतिशत तक अशुद्धियां पाई गईं।
गोदामों में भंडारण से पहले जब मार्कफेड सर्वेयरों ने सैंपल जांच की, तो बड़ी मात्रा में गड़बड़ी सामने आई। इसके बाद 6756 क्विंटल मसूर को अमानक घोषित कर अलग स्टेक में सुरक्षित रखवा दिया गया है। साथ ही संबंधित संस्थाओं को पत्र जारी कर इस मसूर की अपग्रेडिंग यानी सफाई और सुधार की प्रक्रिया अपनाने के निर्देश दिए गए हैं।
अधिकारियों के अनुसार, अपग्रेडिंग पूरी होने तक इस मसूर के खिलाफ कोई भुगतान जारी नहीं किया जाएगा। इसका सीधा असर किसानों पर पड़ रहा है, क्योंकि कुल लगभग 4.72 करोड़ रुपये का भुगतान फिलहाल अटक गया है। कई मामलों में यह भी स्पष्ट नहीं हो पाया है कि कौन सी अमानक उपज किन किसानों से संबंधित है, जिससे स्थिति और जटिल हो गई है।
जिले में अब तक 2316 किसानों से 64,529 क्विंटल मसूर और 356 किसानों से 8,885 क्विंटल चना की खरीदी की जा चुकी है। कुल 31.60 करोड़ रुपये मूल्य की उपज में से 21.62 करोड़ रुपये के ईपीओ जारी किए गए हैं, जिनमें से 15.09 करोड़ रुपये किसानों के खातों में पहुंच चुके हैं।
हालांकि, 10 प्रतिशत से अधिक मसूर अमानक पाए जाने के कारण किसानों के भुगतान पर संकट गहराता जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि जब तक पूरी उपज को मानक के अनुरूप अपग्रेड नहीं किया जाता, तब तक भुगतान प्रक्रिया रुकी रहेगी। वहीं चना और मसूर की खरीद 28 मई तक जारी रहने की जानकारी भी दी गई है।
यह मामला न केवल खरीद प्रक्रिया की गुणवत्ता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि किसानों के भुगतान में देरी की गंभीर समस्या को भी उजागर करता है।
