महिला शिक्षिका का आरोप है कि प्राचार्य खाली पीरियड के दौरान उन्हें अपने साथ बाहर घूमने के लिए कहते थे। वायरल वीडियो में शिक्षिका कथित तौर पर प्राचार्य से कहती सुनाई देती हैं कि उन्होंने ऐसा एक बार नहीं, बल्कि तीन बार कहा था। शिक्षिका के मुताबिक, स्कूल में खाली समय को लेकर दिए गए इस निर्देश से वह असहज थीं। मामले को लेकर स्कूल परिसर में विवाद होने और शिक्षिका की ओर से पुलिस थाने जाने की बात कहे जाने का भी उल्लेख किया गया है।
वीडियो में दिखाई देने वाले घटनाक्रम के अनुसार, जब महिला शिक्षिका ने थाने जाने की बात कही, तो प्राचार्य उनके पैर पकड़कर माफी मांगते नजर आए। इस दृश्य के सामने आने के बाद यह सवाल उठ रहा है कि विवाद किन परिस्थितियों में हुआ था और माफी मांगने की नौबत क्यों आई। हालांकि, केवल वीडियो के आधार पर पूरे मामले के सभी पहलुओं या आरोपों की सत्यता का अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
वीडियो में महिला शिक्षिका एक अन्य शिक्षिका का जिक्र करते हुए यह भी कहती सुनाई देती हैं कि उन्होंने पहले महिला एवं बाल विकास विभाग के समक्ष अपने बयान बदलकर प्राचार्य को बचाया था। शिक्षिका कथित तौर पर यह मांग भी करती हैं कि स्कूल में भविष्य में इस तरह का व्यवहार दोबारा नहीं होना चाहिए। यह बयान मामले में पहले हुई किसी शिकायत या विभागीय प्रक्रिया की ओर संकेत करता है, लेकिन उपलब्ध जानकारी में उस प्रक्रिया के आधिकारिक निष्कर्षों का विवरण नहीं दिया गया है।
मामले से जुड़ी जानकारी के अनुसार, दोनों महिला शिक्षिकाओं को बाद में नौकरी छोड़नी पड़ी। आरोप है कि प्राचार्य महिला शिक्षिकाओं को अकेले में बुलाते थे और खाली पीरियड के दौरान अपने साथ समय बिताने का दबाव बनाते थे। शिक्षिकाओं की ओर से कथित अनुचित टिप्पणियों और मानसिक परेशानी की शिकायत भी सामने आई है। हालांकि, नौकरी छोड़ने के कारणों और परिस्थितियों की आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध विवरण में नहीं है।
दूसरी ओर, प्राचार्य राकेश कुलश्रेष्ठ ने अपने ऊपर लगे आरोपों को निराधार बताया है। उनका कहना है कि आरोप लगाने वाली दोनों महिलाओं ने झूठी शिकायतें की थीं और बाद में नौकरी छोड़कर चली गईं। इस तरह मामले में शिकायतकर्ता पक्ष के आरोप और प्राचार्य का पक्ष एक-दूसरे से अलग हैं। वायरल वीडियो ने विवाद को सार्वजनिक चर्चा में ला दिया है, लेकिन पूरे घटनाक्रम को स्पष्ट करने के लिए संबंधित पक्षों के बयान, शिकायतों के रिकॉर्ड और किसी आधिकारिक जांच के निष्कर्ष महत्वपूर्ण होंगे।
शिक्षण संस्थानों में कार्यरत महिला कर्मचारियों की गरिमा, सुरक्षित वातावरण और शिकायतों के निष्पक्ष निपटारे का मुद्दा इस मामले के केंद्र में है। फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर आरोपों को स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। मामले की वास्तविक स्थिति जानने के लिए संबंधित विभाग या प्रशासन की ओर से की गई कार्रवाई और जांच से जुड़ी आधिकारिक जानकारी का सामने आना जरूरी है।
