इस योजना को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि स्वामित्व योजना में प्रॉपर्टी कार्ड और रजिस्ट्री एक जैसी चीज नहीं हैं। ग्रामीण आबादी की जमीन का सर्वे कर तैयार किए गए अधिकार अभिलेख में संपत्ति पर संबंधित व्यक्ति के अधिकार का रिकॉर्ड दर्ज होता है। अब सरकार इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए चयनित संपत्तियों का पंजीयन कराने जा रही है। यानी पहले से तैयार रिकॉर्ड को पंजीकृत दस्तावेज का रूप दिया जाएगा।
सरकार ने इसके लिए अलग से बड़े पैमाने पर प्रशासनिक व्यवस्था की है। पंचायत स्तर पर शिविर लगाए जाने की योजना है ताकि लोगों को रजिस्ट्री कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें। पंजीयन प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए कुछ अधिकारियों को उप-पंजीयक की शक्तियां भी दी गई हैं। सरकार का लक्ष्य इस अभियान के दौरान बड़ी संख्या में संपत्तियों का पंजीयन कम समय में पूरा करना है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक अभियान एक महीने तक चलाया जाएगा और पंजीयन के बाद दस्तावेज डिजिटल माध्यम से भी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है।
इसका फायदा हर व्यक्ति को अपने आप नहीं मिलेगा। अभियान में वही संपत्तियां शामिल हैं जिनके अधिकार अभिलेख स्वामित्व योजना के तहत पहले से तैयार और मंजूर हैं। इसका मतलब यह है कि अगर किसी व्यक्ति का नाम अभी स्वामित्व योजना के तैयार रिकॉर्ड में शामिल नहीं है तो केवल इस अभियान के दौरान आवेदन करके तुरंत मुफ्त रजिस्ट्री कराने की सुविधा नहीं होगी। पहले उसका रिकॉर्ड योजना की प्रक्रिया के तहत तैयार होना जरूरी होगा।
रजिस्ट्री होने के बाद संपत्ति के मालिक के पास उसका पंजीकृत दस्तावेज होगा। इससे संपत्ति से जुड़े सरकारी रिकॉर्ड को और मजबूत आधार मिल सकता है। सरकार का कहना है कि पंजीकृत दस्तावेज के आधार पर पात्रता और बैंक की अन्य शर्तें पूरी होने पर संपत्ति के बदले ऋण लेने में भी मदद मिल सकती है। इसके अलावा संपत्ति को कारोबार या स्वरोजगार के लिए इस्तेमाल करने के रास्ते भी आसान हो सकते हैं।
हालांकि जमीन विवादित होने पर स्थिति अलग हो सकती है। सिर्फ रजिस्ट्री हो जाने से किसी पुराने मालिकाना विवाद का अपने आप अंत नहीं माना जा सकता। यदि किसी संपत्ति पर किसी दूसरे व्यक्ति का दावा है या मामला राजस्व अथवा सिविल कोर्ट में चल रहा है तो उसका कानूनी निपटारा अलग प्रक्रिया से ही होगा। इसलिए रजिस्ट्री को हर तरह के भूमि विवाद का अंतिम समाधान मानना सही नहीं होगा।
इस अभियान के बीच पटवारियों की आपत्ति भी सामने आई है। पटवारी संघों की चिंता अतिरिक्त जिम्मेदारी और रिकॉर्ड में भविष्य में सामने आने वाली किसी गलती की जवाबदेही को लेकर बताई गई है। उनका सवाल है कि यदि खसरे नक्शे या सर्वे रिकॉर्ड में कोई त्रुटि निकलती है और उसके आधार पर विवाद खड़ा होता है तो जिम्मेदारी किसकी होगी। कुछ पटवारी संगठनों ने इस तरह की जिम्मेदारी के साथ अधिकार भी स्पष्ट करने की मांग की है।
यह मुद्दा सरकार के स्तर पर भी उठा है। रिपोर्टों के मुताबिक मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अधिकारियों को पटवारियों की आशंकाएं दूर करने के निर्देश दिए हैं। सरकार की ओर से यह कहा गया है कि रजिस्ट्री का काम शासन स्तर से कराया जा रहा है और प्रक्रिया को लेकर अनावश्यक चिंता की जरूरत नहीं है।
यानी स्वामित्व योजना के तहत शुरू हो रहा यह अभियान उन ग्रामीण परिवारों के लिए महत्वपूर्ण है जिनकी संपत्ति पहले से योजना के रिकॉर्ड में दर्ज है। लेकिन किसी नए दावे या पुराने विवाद को केवल मुफ्त रजिस्ट्री के जरिए खत्म नहीं किया जाएगा। ऐसे मामलों में संबंधित राजस्व या न्यायिक प्रक्रिया ही लागू होगी। अब अभियान शुरू होने के साथ यह देखना अहम होगा कि चयनित 50 लाख से ज्यादा संपत्तियों का पंजीयन तय समय में किस तरह पूरा होता है।
