रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 में राज्य का कुल वन आवरण 77444.98 वर्ग किलोमीटर था जो वर्ष 2023 में घटकर 77073.44 वर्ग किलोमीटर रह गया। यह गिरावट ऐसे समय दर्ज हुई है जब देश के कई राज्यों ने अपने वन क्षेत्र में वृद्धि दर्ज कराई है। बिहार गुजरात कर्नाटक केरल मिजोरम ओडिशा और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने वन क्षेत्र बढ़ाने में सफलता हासिल की जबकि मध्य प्रदेश में लगातार कमी दर्ज हुई।
सिर्फ वन क्षेत्र कम होने का मामला ही चिंता का विषय नहीं है बल्कि पिछले पांच वर्षों में विकास परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर वनभूमि का उपयोग बदला गया है। एक अप्रैल 2021 से 31 मार्च 2026 के बीच देशभर में 105594 हेक्टेयर से अधिक वनभूमि गैर वानिकी कार्यों के लिए स्वीकृत की गई। इनमें अकेले मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग 24970 हेक्टेयर रही जो पूरे देश की कुल डायवर्ट की गई वनभूमि का लगभग चौथाई हिस्सा है। इससे साफ है कि सड़क निर्माण खनन ऊर्जा परियोजनाओं और अन्य विकास कार्यों के लिए सबसे अधिक वनभूमि मध्य प्रदेश में ही दी गई।
खनन परियोजनाएं इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह मानी जा रही हैं। देशभर में खनन और उत्खनन के लिए हजारों हेक्टेयर वनभूमि स्वीकृत हुई जिसमें मध्य प्रदेश की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही। इसके अलावा सड़क निर्माण जलविद्युत परियोजनाओं सिंचाई योजनाओं और बिजली ट्रांसमिशन लाइनों के लिए भी बड़ी मात्रा में जंगलों की जमीन का उपयोग बदला गया। पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि विकास आवश्यक है लेकिन इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन भविष्य में गंभीर पर्यावरणीय संकट पैदा कर सकता है।
मध्य प्रदेश को टाइगर स्टेट कहा जाता है और यहां कान्हा बांधवगढ़ पन्ना तथा सतपुड़ा जैसे विश्व प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व मौजूद हैं। लगातार वन कटाई और आधारभूत ढांचा परियोजनाओं के विस्तार से इन अभयारण्यों के बीच मौजूद प्राकृतिक वन्यजीव कॉरिडोर प्रभावित होने की आशंका बढ़ रही है। इससे बाघों सहित अन्य वन्यजीवों की आवाजाही बाधित हो सकती है और मानव वन्यजीव संघर्ष के मामलों में भी वृद्धि हो सकती है।
केंद्र सरकार का कहना है कि वनभूमि के उपयोग में बदलाव की अनुमति मिलने पर प्रतिपूरक वनीकरण अनिवार्य किया जाता है। इसके साथ ही नेट प्रेजेंट वैल्यू के रूप में जमा राशि का उपयोग CAMPA के माध्यम से नए जंगल विकसित करने में किया जाता है। सरकार ने वर्ष 2030 तक देश में 26 मिलियन हेक्टेयर बंजर और अवक्रमित भूमि को पुनर्जीवित करने का लक्ष्य भी तय किया है। इसके लिए राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम और हरित भारत मिशन के तहत कई योजनाएं संचालित की जा रही हैं।
वहीं विपक्ष ने सरकार की वन नीति पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि बड़े उद्योगों और खनन परियोजनाओं को प्राथमिकता देने के कारण जंगलों पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि प्रतिपूरक वनीकरण की गुणवत्ता का डिजिटल ऑडिट किया जाए और पर्यावरणीय प्रभावों की स्वतंत्र समीक्षा नियमित रूप से हो ताकि विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन कायम रखा जा सके। मध्य प्रदेश के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही है कि विकास की गति भी बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए हरियाली और वन संपदा भी सुरक्षित रह सके।
