मामला अदालत पहुंचने के बाद साध्वी समेत अन्य आरोपियों ने कार्रवाई को चुनौती दी। अपर सत्र न्यायालय ने 13 अगस्त को निचली अदालत द्वारा तय किए गए आरोपों का रिकॉर्ड देखा और उन्हें निरस्त कर दिया। अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया जिससे यह साबित हो कि साध्वी जेठ या जेठानी ने शिकायतकर्ता को दहेज के लिए प्रताड़ित किया था। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि कथित प्रताड़ना कब कहां और किस तरह हुई इसका स्पष्ट आधार रिकॉर्ड पर मौजूद नहीं है।
मामला उस समय सामने आया जब शिकायतकर्ता महिला ने एरोड्रम थाने में दहेज प्रताड़ना की शिकायत दर्ज कराई। शिकायत में पति के राजस्थान में रहने वाले भाई भाभी और उसकी बहन को भी आरोपी बनाया गया। परिवार की ओर से पुलिस को यह जानकारी दिए जाने का दावा किया गया कि संबंधित रिश्तेदारों का शिकायतकर्ता से कोई संपर्क नहीं रहा था। इसके बावजूद पुलिस ने जांच आगे बढ़ाई और आरोपियों के खिलाफ चालान कोर्ट में पेश कर दिया।
इसके बाद प्रथम श्रेणी न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत ने चालान के आधार पर आरोप तय कर दिए। इसी कार्रवाई को चुनौती देते हुए बचाव पक्ष ने अपर सत्र न्यायालय का रुख किया। आरोपी पक्ष की ओर से एडवोकेट महेंद्र मौर्य ने अदालत में तर्क दिया कि पति की बहन ने वर्ष 1980 में ही बाल साध्वी के रूप में वैराग्य अपना लिया था। सांसारिक जीवन छोड़ने के बाद वह परिवार से अलग रही और उसका शिकायतकर्ता से कोई नियमित संपर्क नहीं था।
बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि संबंधित साध्वी शिकायतकर्ता की शादी में शामिल तक नहीं हुई थी। ऐसे में शादी के समय दहेज को लेकर किसी तरह की मांग या प्रताड़ना में उसकी भूमिका होने का सवाल ही नहीं उठता। इसी तरह मामले में आरोपी बनाए गए जेठ और जेठानी भी राजस्थान में रहते थे और वे भी शिकायतकर्ता की शादी में शामिल नहीं हुए थे। बचाव पक्ष ने आरोप लगाया कि पुलिस ने शिकायत में लगाए गए आरोपों की वास्तविकता और प्रत्येक आरोपी की व्यक्तिगत भूमिका की पर्याप्त जांच किए बिना ही कार्रवाई आगे बढ़ाई।
मामले की सुनवाई अपर सत्र न्यायाधीश मनीष लोवंशी की अदालत में हुई। कोर्ट ने केस रिकॉर्ड और उपलब्ध सामग्री का परीक्षण करने के बाद पाया कि साध्वी जेठ और जेठानी द्वारा शिकायतकर्ता को दहेज के लिए प्रताड़ित किए जाने का कोई ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं है। अदालत के सामने यह स्पष्ट नहीं हो सका कि कथित आरोपियों ने शिकायतकर्ता को कब कैसे और कहां दहेज के लिए प्रताड़ित किया।
अदालत ने माना कि केवल आरोप लगाए जाने के आधार पर आरोप तय करने के लिए पर्याप्त ठोस आधार जरूरी है। रिकॉर्ड में आरोपियों की कथित भूमिका को लेकर पर्याप्त सामग्री नहीं मिलने के कारण निचली अदालत द्वारा आरोप तय करने में त्रुटि हुई। इसके बाद अपर सत्र न्यायालय ने साध्वी समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ तय किए गए आरोपों को निरस्त कर दिया।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अदालत के सामने आरोपी महिला की सामाजिक और पारिवारिक स्थिति से जुड़े तथ्य भी सामने आए। वर्ष 1980 में वैराग्य अपना चुकी साध्वी के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का आरोप लगाया गया जबकि बचाव पक्ष के अनुसार वह शिकायतकर्ता की शादी में शामिल नहीं हुई थी और लंबे समय से परिवार से अलग जीवन जी रही थी। अदालत के फैसले ने फिलहाल उसके खिलाफ तय आरोपों को खत्म कर दिया है और मामले में आरोपियों की वास्तविक भूमिका के लिए ठोस साक्ष्य की आवश्यकता को रेखांकित किया है।
