कैसे चलता था पूरा हनीट्रैप सिस्टम?
पुलिस के अनुसार गैंग बेहद संगठित तरीके से काम करता था। पहले किसी महिला के जरिए टारगेट से नजदीकी बढ़ाई जाती थी। फिर निजी मुलाकातों में आपत्तिजनक फोटो और वीडियो रिकॉर्ड किए जाते थे। इसके बाद धमकी देकर लाखों-करोड़ों की वसूली शुरू हो जाती थी। गैंग के सदस्य खुद को कभी कारोबारी, कभी राजनीतिक संपर्क वाला व्यक्ति बताकर भरोसा जीतते थे। कई मामलों में फर्जी पहचान और सोशल मीडिया नेटवर्क का भी इस्तेमाल किया गया।
हाईप्रोफाइल नामों तक पहुंचने की कोशिश
जांच में यह भी सामने आया है कि इस गिरोह ने सिर्फ स्थानीय नहीं, बल्कि दिल्ली तक के नेताओं को टारगेट करने की कोशिश की थी। पुलिस को शक है कि गैंग के पास कई प्रभावशाली लोगों के निजी वीडियो और डाटा मौजूद हैं, जिनका इस्तेमाल दबाव बनाने में किया जा रहा था।
पुलिस की बड़ी कार्रवाई, 40 अफसरों की टीम एक्टिव
मामले की गंभीरता को देखते हुए क्राइम ब्रांच ने 40 से अधिक पुलिसकर्मियों की 7 टीमें बनाकर इंदौर और भोपाल में एक साथ छापेमारी की। पांच मुख्य आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है और कई मोबाइल, लैपटॉप और डिजिटल सबूत जब्त किए गए हैं। पुलिस को यह भी शक है कि कुछ वीडियो एआई (AI) तकनीक से तैयार किए गए हो सकते हैं, जिसकी जांच की जा रही है।
ड्रग्स और हथियार नेटवर्क से भी जुड़े तार
जांच में सामने आया है कि इस गैंग के कुछ सदस्य ड्रग्स और अवैध हथियार तस्करी नेटवर्क से भी जुड़े हो सकते हैं। पुलिस अब बैंक ट्रांजैक्शन, कॉल डिटेल्स और सोशल मीडिया चैट्स की गहन जांच कर रही है।
बदनामी के डर से कई पीड़ित सामने नहीं आए
पुलिस का मानना है कि इस गिरोह ने कई बड़े कारोबारियों और नेताओं को पहले भी निशाना बनाया है, लेकिन सामाजिक बदनामी के डर से कई लोग शिकायत दर्ज नहीं करा रहे।
उज्जैन से शुरू हुआ विवाद, बना बड़ा रैकेट
सूत्रों के मुताबिक अलका दीक्षित का उज्जैन में एक जमीन विवाद था, जिसके बाद उसने हनीट्रैप का रास्ता अपनाया। धीरे-धीरे यह नेटवर्क भोपाल, इंदौर और आसपास के जिलों तक फैल गया।
डीसीपी क्राइम ब्रांच के अनुसार जांच अभी शुरुआती चरण में है और आने वाले दिनों में कई बड़े और चौंकाने वाले नाम सामने आ सकते हैं।
