पहले मामले में जनपद पंचायत छिन्दवाड़ा में तत्कालीन पंचायत समन्वय अधिकारी के पद पर पदस्थ रहे सुनील कुमार अंधवान के खिलाफ अंत्येष्टि और अनुग्रह सहायता से संबंधित अनियमितताओं की जांच की गई थी। जांच में उनके द्वारा 23 फर्जी प्रकरण तैयार किए जाने और इनके माध्यम से 50.25 लाख रुपये के शासकीय धन के गबन का आरोप सही पाया गया।
प्रकरण में कार्रवाई करते हुए राज्य सरकार ने सुनील कुमार अंधवान को दंडित किया है। उनकी पेंशन राशि को न्यूनतम स्तर पर निर्धारित करते हुए अब 7,750 रुपये कर दिया गया है। अंधवान 30 जून 2025 को शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे। सेवानिवृत्ति के बाद भी मामले में सामने आई वित्तीय अनियमितताओं को लेकर उनके खिलाफ पेंशन नियमों के तहत कार्रवाई की गई।
अंत्येष्टि और अनुग्रह सहायता जरूरतमंद परिवारों को आर्थिक मदद उपलब्ध कराने से जुड़ी सरकारी व्यवस्था है। ऐसे मामलों में फर्जी प्रकरण तैयार कर शासकीय राशि का इस्तेमाल किए जाने को गंभीर वित्तीय अनियमितता माना गया है। इसी आधार पर सेवानिवृत्त अधिकारी की पेंशन पर दंडात्मक कार्रवाई की गई।
दूसरे मामले में जनजातीय कार्य विभाग के अंतर्गत झाबुआ जिले के पेटलावद तहसील स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय झकनावदा में प्राचार्य और प्रभारी विकासखंड शिक्षा अधिकारी के पद पर रहीं शकुंतला शंखवार की देय पेंशन स्थायी रूप से रोक दी गई है।
शकुंतला शंखवार के खिलाफ लोकायुक्त विशेष पुलिस स्थापना इंदौर से जुड़े एक आपराधिक प्रकरण में विशेष न्यायालय झाबुआ ने 4 दिसंबर 2025 को फैसला सुनाया था। न्यायालय ने उन्हें अलग-अलग मामलों में चार-चार वर्ष के कारावास की सजा सुनाई थी। इसके साथ ही उन पर पांच-पांच हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया गया था।
न्यायालय से सजा मिलने के बाद राज्य सरकार ने पेंशन संबंधी प्रावधानों के तहत उनके खिलाफ कार्रवाई की। इसके परिणामस्वरूप उनकी देय पेंशन को स्थायी रूप से रोकने का निर्णय लिया गया।
दोनों मामलों में सरकार की कार्रवाई से स्पष्ट है कि शासकीय सेवा के दौरान वित्तीय अनियमितता या भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में सेवानिवृत्ति के बाद भी पेंशन संबंधी प्रावधानों के तहत दंडात्मक कदम उठाए जा सकते हैं। एक मामले में सरकारी धन के गबन से जुड़े आरोप सही पाए जाने के बाद पेंशन न्यूनतम की गई, जबकि दूसरे मामले में न्यायालय से दोषसिद्धि के बाद पेंशन स्थायी रूप से रोक दी गई।
