रिपोर्ट के अनुसार, लोकायुक्त कार्यालय के एक टेक्नीशियन ने कथित तौर पर दावा किया कि डीएसपी स्तर के अधिकारियों के माध्यम से जांच में राहत दिलाई जा सकती है। आरोप है कि एक मामले में क्लीनचिट दिलाने के लिए 3 लाख रुपये और अन्य स्तरों पर अलग-अलग रकम की मांग की गई। स्टिंग में शामिल बातचीत में एक महिला डीएसपी द्वारा कथित तौर पर यह कहते हुए सुना गया कि “चोरी सब करते हैं, जो पकड़ाया वही चोर होता है”, जिसके बाद मामले ने और तूल पकड़ लिया।
कथित बातचीत के दौरान अधिकारियों ने जांच प्रक्रिया, नोटिस, वॉयस सैंपल और दस्तावेजों को लेकर भी चर्चा की। आरोप है कि जांच से जुड़ी गोपनीय जानकारी और ट्रांसक्रिप्ट तक उपलब्ध कराने की पेशकश की गई। इतना ही नहीं, कथित तौर पर पैसे नहीं मिलने पर संबंधित पक्ष पर दबाव बनाने और जांच प्रभावित करने जैसी बातें भी सामने आईं।
मामले का एक और गंभीर पहलू यह है कि लोकायुक्त द्वारा प्रस्तुत खात्मा रिपोर्टों को लेकर भी सवाल उठे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष जनवरी से अप्रैल के बीच विशेष अदालत ने लोकायुक्त की ओर से पेश की गई कई खात्मा रिपोर्टों को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने जांच में कमियां, अधूरे साक्ष्य और आवश्यक गवाहों के बयान दर्ज न किए जाने जैसी खामियों की ओर संकेत किया।
आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में ट्रैप कार्रवाई की संख्या बढ़ी है, लेकिन दोषसिद्धि के मामलों में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। इससे जांच की गुणवत्ता और अभियोजन की प्रभावशीलता पर भी प्रश्न उठ रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं। विपक्ष ने मामले की निष्पक्ष जांच और जवाबदेही तय करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि भ्रष्टाचार की जांच करने वाली संस्था पर ही ऐसे आरोप लगते हैं, तो आम नागरिकों का भरोसा प्रभावित होना स्वाभाविक है।
हालांकि, इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों या लोकायुक्त संगठन की ओर से अंतिम और आधिकारिक निष्कर्ष सामने आना अभी बाकी है। ऐसे मामलों में जांच पूरी होने और सक्षम एजेंसियों द्वारा तथ्यों की पुष्टि होने तक आरोपों को आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। फिलहाल यह मामला प्रदेश के प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में चर्चा का प्रमुख विषय बना हुआ है।
