वॉशिंगटन। ईरान के साथ जारी सैन्य संघर्ष अमेरिका के लिए लगातार महंगा साबित हो रहा है। अमेरिकी सैन्य आकलन के मुताबिक, फरवरी में शुरू हुए युद्ध पर अब तक करीब 45.1 अरब डॉलर खर्च हो चुके हैं। यह राशि नेपाल की सालाना अर्थव्यवस्था के आकार के आसपास बैठती है। वहीं, अमेरिकी कांग्रेस के गैर-पक्षपाती बजट कार्यालय (CBO) ने 1 अगस्त तक युद्ध की प्रत्यक्ष लागत करीब 38 अरब डॉलर आंकी थी।
ताजा 45.1 अरब डॉलर का आंकड़ा अमेरिकी रक्षा विभाग की ओर से कांग्रेस के समक्ष साझा किए गए आकलन से जुड़ा है। इसमें युद्ध के दौरान इस्तेमाल किए गए हथियारों और सैन्य उपकरणों की भरपाई समेत अन्य परिचालन खर्च शामिल हैं। हालांकि, मध्य पूर्व में क्षतिग्रस्त अमेरिकी सैन्य ठिकानों की पूरी मरम्मत का खर्च इसमें शामिल नहीं है।
पुराने अनुमान से बढ़ी युद्ध की लागत
CBO ने सितंबर में बताया था कि 28 फरवरी से 1 अगस्त 2026 तक ईरान युद्ध पर अमेरिका के रक्षा विभाग की लागत करीब 38 अरब डॉलर रही। एजेंसी के मुताबिक, संघर्ष जारी रहने पर इसकी लागत हर महीने लगभग 2 से 3 अरब डॉलर और बढ़ सकती है।
वहीं, अमेरिकी सेंट्रल कमांड से जुड़े हालिया आकलन में युद्ध की लागत सितंबर की शुरुआत तक करीब 43.6 अरब डॉलर बताई गई थी। इसमें करीब 28 अरब डॉलर इस्तेमाल किए गए हथियारों और गोला-बारूद की भरपाई तथा 4.3 अरब डॉलर से अधिक उपकरणों के नुकसान से संबंधित खर्च शामिल था। अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुए नुकसान की भविष्य की मरम्मत लागत इसमें शामिल नहीं थी।
हर महीने बढ़ सकता है 2 से 3 अरब डॉलर का बोझ
CBO का अनुमान है कि युद्ध की तीव्रता के आधार पर अमेरिका को हर महीने करीब 2 से 3 अरब डॉलर अतिरिक्त खर्च करने पड़ सकते हैं। इसका मतलब है कि संघर्ष लंबा खिंचने पर अमेरिकी रक्षा बजट पर दबाव और बढ़ सकता है। युद्ध के कारण अमेरिकी हथियार भंडार पर भी दबाव पड़ा है और इस्तेमाल किए गए कुछ हथियारों की भरपाई में कई वर्ष लगने का अनुमान सामने आया है।
इसके अलावा, मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुए नुकसान की मरम्मत और उपकरणों के पुनर्निर्माण का खर्च अलग से जुड़ सकता है। इसलिए युद्ध की अंतिम लागत मौजूदा अनुमानों से अधिक होने की संभावना बनी हुई है।
होर्मुज को लेकर ईरान का रुख सख्त
इस बीच ईरान ने रणनीतिक होर्मुज जलडमरूमध्य को दोबारा खोलने को लेकर अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। ईरानी संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर गालिबाफ ने कहा है कि जब तक ईरान की शर्तें पूरी नहीं होतीं और अमेरिका अपनी प्रतिबद्धताओं को लागू नहीं करता, तब तक होर्मुज को फिर से खोलने की स्थिति नहीं बनेगी।
गालिबाफ ने कहा कि ईरान को एक साथ सैन्य और कूटनीतिक दोनों रास्तों पर आगे बढ़ना होगा। उनके मुताबिक, ईरान सैन्य क्षमता के जरिए अपने विरोधियों का मुकाबला करेगा और उचित समय पर कूटनीति के जरिए युद्धक्षेत्र में हासिल बढ़त को मजबूत करेगा।
कतर के जरिए अमेरिका तक पहुंचाई गईं शर्तें
ईरान ने अमेरिका के साथ बातचीत दोबारा शुरू करने के लिए सात शर्तें कतर के माध्यम से भेजे जाने की बात कही है। ईरान के सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव मोहसिन रेजाई के मुताबिक, तेहरान अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के जवाब का इंतजार कर रहा है। इन शर्तों में युद्ध समाप्त करना, नौसैनिक नाकाबंदी हटाना और ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियों से जुड़े मुद्दे शामिल बताए गए हैं। ईरान ने हालांकि सभी सात शर्तों की आधिकारिक पूरी सूची सार्वजनिक नहीं की है।
गालिबाफ के ताजा बयान से संकेत मिलता है कि तेहरान बातचीत का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं कर रहा, लेकिन वह इसे अपनी घोषित शर्तों से जोड़ रहा है।
वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी असर
ईरान-अमेरिका संघर्ष और होर्मुज में जारी बाधाओं का असर वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहा है। होर्मुज दुनिया के प्रमुख तेल परिवहन मार्गों में से एक है। यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने से कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की आपूर्ति पर दबाव बढ़ा है।
CBO ने भी चेतावनी दी है कि ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी का असर अमेरिकी महंगाई पर पड़ सकता है। उसके अनुमान के अनुसार, 2027 की पहली तिमाही में व्यक्तिगत उपभोग व्यय (PCE) महंगाई दर पहले के अनुमान की तुलना में करीब 0.5 प्रतिशत अंक अधिक हो सकती है।
इस तरह ईरान युद्ध का असर केवल अमेरिकी सैन्य खर्च तक सीमित नहीं है, बल्कि हथियार भंडार, रक्षा बजट, ऊर्जा कीमतों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर भी पड़ रहा है। संघर्ष जितना लंबा चलेगा, अमेरिका और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर इसकी वित्तीय लागत उतनी ही बढ़ सकती है।
