हनोई/नई दिल्ली। भारत और वियतनाम के बीच रणनीतिक संबंधों को नई मजबूती देने के उद्देश्य से रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने वियतनाम दौरे के दौरान वहां के शीर्ष नेतृत्व से अहम बातचीत की। इस बैठक में रक्षा सहयोग, सुरक्षा साझेदारी और क्षेत्रीय स्थिरता जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में शांति और संतुलन बनाए रखने में भारत और वियतनाम की साझेदारी बेहद अहम भूमिका निभा सकती है।
राजनाथ सिंह ने इस दौरान भारत की ओर से वियतनाम के साथ रक्षा सहयोग को और गहरा करने की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा कि दोनों देशों के बीच साझेदारी केवल रक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आपसी विश्वास, तकनीकी सहयोग और सामरिक समझ पर आधारित एक व्यापक संबंध है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से भी शुभकामनाएं वियतनाम नेतृत्व को दीं।
इसी बीच भारत के ऐतिहासिक विदेश नीति दृष्टिकोण की चर्चा भी एक बार फिर सामने आई है। कहा जाता है कि भारत के पहले प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru ने 1960 के दशक में अमेरिका के वियतनाम युद्ध में गहराई से शामिल होने पर सावधानी बरतने की सलाह दी थी। हालांकि ऐतिहासिक दस्तावेजों में उनके विचार सीधे और औपचारिक रूप में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं हैं, लेकिन कई समकालीन लेखों और स्मृतियों में उनके इस रुख का उल्लेख मिलता है कि वियतनाम में सैन्य हस्तक्षेप से बचना चाहिए।
आगे चलकर वियतनाम युद्ध ने वैश्विक राजनीति पर गहरा असर डाला, जिसमें भारी जनहानि और लंबे संघर्ष के बाद अंततः अमेरिका को पीछे हटना पड़ा। युद्ध के बाद वियतनाम एकीकृत राष्ट्र के रूप में उभरा।
भारत और वियतनाम के संबंध केवल रणनीतिक ही नहीं बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रूप से भी गहरे हैं। 1959 में तत्कालीन राष्ट्रपति Rajendra Prasad ने हो ची मिन्ह को बोधि वृक्ष भेंट किया था, जो आज भी दोनों देशों की मित्रता का प्रतीक माना जाता है। यह प्रतीक समय-समय पर भारत-वियतनाम रिश्तों की मजबूती को दर्शाता रहा है।
