इतिहास से जुड़े दस्तावेज बताते हैं कि 1948 में उत्तर कोरिया के गठन और किम इल सुंग के सत्ता में आने से पहले यह क्षेत्र एकीकृत कोरिया का हिस्सा था। उस समय राजधानी प्योंगयांग शिक्षा, संस्कृति और ईसाई धर्म का प्रमुख केंद्र थी। बड़ी संख्या में चर्च, मिशनरी स्कूल और आधुनिक शिक्षण संस्थान मौजूद थे। इसी वजह से प्योंगयांग को कभी “पूर्व का यरुशलम” भी कहा जाता था। यहां लोगों को धार्मिक आस्था और सामाजिक जीवन में अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी।
औद्योगिक विकास में था सबसे आगे
1910 से 1945 के बीच जापान के औपनिवेशिक शासन के दौरान कोरियाई प्रायद्वीप के उत्तरी हिस्से को औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित किया गया। यहां खनिज संपदा, कोयला और प्राकृतिक संसाधनों की प्रचुरता के कारण बड़े स्टील प्लांट, जलविद्युत परियोजनाएं, रासायनिक कारखाने और रेलवे नेटवर्क विकसित किए गए। उस समय दक्षिणी क्षेत्र मुख्य रूप से कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर निर्भर था, जबकि उत्तर तकनीकी और औद्योगिक रूप से अधिक मजबूत माना जाता था।
विभाजन के बाद बदल गई तस्वीर
द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद 1945 में कोरिया को 38वीं समानांतर रेखा के आधार पर दो हिस्सों में बांट दिया गया। उत्तरी भाग सोवियत संघ के प्रभाव में आया और 1948 में किम इल सुंग के नेतृत्व में उत्तर कोरिया की स्थापना हुई। इसके बाद 1950 से 1953 तक चले कोरियाई युद्ध ने देश के बड़े हिस्से को तबाह कर दिया। भारी बमबारी में शहर, उद्योग और बुनियादी ढांचा नष्ट हो गया।
युद्ध के बाद सोवियत संघ और चीन की आर्थिक सहायता से उत्तर कोरिया ने तेज़ी से पुनर्निर्माण किया और 1970 के दशक तक उसकी अर्थव्यवस्था कई मामलों में दक्षिण कोरिया के बराबर या उससे बेहतर मानी जाती थी।
‘जुचे’ नीति और अलगाव की शुरुआत
बाद के वर्षों में किम इल सुंग ने ‘जुचे’ (आत्मनिर्भरता) की नीति अपनाई, जिसके तहत देश ने बाहरी दुनिया से लगभग पूरी तरह दूरी बना ली। 1990 के दशक में सोवियत संघ के विघटन के बाद आर्थिक सहायता और सस्ते तेल की आपूर्ति बंद हो गई, जिससे उत्तर कोरिया गंभीर आर्थिक संकट और अकाल की चपेट में आ गया। अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, उस दौर में भुखमरी और कुपोषण से बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई।
दक्षिण और उत्तर कोरिया की अलग राह
जहां दक्षिण कोरिया ने लोकतांत्रिक व्यवस्था और खुली अर्थव्यवस्था को अपनाते हुए तकनीक और उद्योग के क्षेत्र में वैश्विक पहचान बनाई, वहीं उत्तर कोरिया ने सीमित संसाधनों का बड़ा हिस्सा रक्षा और परमाणु कार्यक्रमों पर केंद्रित किया। समय के साथ दोनों देशों के आर्थिक और सामाजिक विकास में बड़ा अंतर पैदा हो गया।
सख्त नियंत्रण वाली व्यवस्था
उत्तर कोरिया में नागरिकों के जीवन पर सरकारी नियंत्रण बेहद कड़ा माना जाता है। वहां सामाजिक स्थिति का निर्धारण कथित ‘सोंगबुन’ व्यवस्था के आधार पर किया जाता है, जिसमें परिवार की राजनीतिक पृष्ठभूमि और शासन के प्रति निष्ठा को महत्व दिया जाता है। शिक्षा व्यवस्था में भी शासन और नेतृत्व से जुड़े विषयों पर विशेष जोर दिया जाता है।
देश के भीतर आवागमन, सूचना तक पहुंच और इंटरनेट जैसी सुविधाओं पर भी व्यापक नियंत्रण है। बाहरी दुनिया से सीमित संपर्क और बंद व्यवस्था के कारण उत्तर कोरिया आज भी दुनिया के सबसे रहस्यमयी देशों में गिना जाता है।
कभी औद्योगिक प्रगति, आधुनिक शिक्षा और आर्थिक विकास का केंद्र रहा यह क्षेत्र आज अपनी राजनीतिक व्यवस्था, सीमित खुलापन और वैश्विक अलगाव के कारण पूरी दुनिया में अलग पहचान रखता है।
