इस प्रस्तावित परियोजना को MEIDP यानी मिडिल ईस्ट टू इंडिया डीप-वॉटर पाइपलाइन के नाम से जाना जाता है। इसके तहत पाइपलाइन ओमान और यूएई के तट से शुरू होकर अरब सागर के नीचे से गुजरते हुए भारत के गुजरात और महाराष्ट्र के तट तक पहुंच सकती है। शुरुआत में इस परियोजना में केवल गैस पाइपलाइन की योजना पर काम किया जा रहा था, लेकिन अब समुद्र के रास्ते कच्चा तेल भारत तक लाने की संभावना पर भी तकनीकी अध्ययन शुरू किया गया है। पेट्रोलियम मंत्रालय के निर्देश पर सरकारी कंपनियां परियोजना की विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर रही हैं। इस रिपोर्ट में गहरे समुद्र में पाइपलाइन बिछाने की तकनीक, लागत, सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच की जाएगी।
इस परियोजना की जरूरत होर्मुज क्षेत्र में जारी तनाव के बीच महसूस की जा रही है। भारत अपनी जरूरत का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है। वहीं, देश में आने वाली आधी से अधिक एलपीजी और एलएनजी भी कतर और यूएई से इसी समुद्री मार्ग के जरिए जहाजों से आती है। ऐसे में ऊर्जा आपूर्ति के लिए वैकल्पिक रास्ता तैयार करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है। समुद्र के नीचे पाइपलाइन के जरिए सीधे आपूर्ति मिलने से समुद्री जहाजों पर निर्भरता कम करने का विकल्प तैयार हो सकता है।
परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती समुद्र की अत्यधिक गहराई में पाइपलाइन बिछाना है। इसके लिए करीब 3,450 मीटर तक की गहराई में पाइपलाइन स्थापित करनी होगी। इतनी गहराई में पानी का दबाव काफी अधिक होता है। इसके अलावा समुद्र तल पर मौजूद चट्टानों और खाइयों के बीच पाइपलाइन के लिए सुरक्षित रास्ता तैयार करना तथा भविष्य में उसकी मरम्मत करना भी बड़ी तकनीकी चुनौतियों में शामिल है। परियोजना के तहत इन सभी पहलुओं का विस्तृत तकनीकी अध्ययन किया जा रहा है।
सीधे ओमान, यूएई, कतर और सऊदी अरब के गैस और तेल भंडार से आपूर्ति मिलने की स्थिति में समुद्री जहाजों पर निर्भरता कम हो सकती है। इससे तेल और गैस के परिवहन तथा बीमा पर होने वाला खर्च घटाने में मदद मिल सकती है। साथ ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल और गैस की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी होने पर भारत पर पड़ने वाला दबाव भी कम किया जा सकता है।
परियोजना विकसित करने वाली संस्था साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज ने करीब 25 करोड़ रुपये की लागत से लगभग 3 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाकर इसका परीक्षण किया है। परियोजना की सभी शर्तें पूरी होने के बाद पूरी पाइपलाइन के निर्माण में करीब 5 से 7 साल लगने का अनुमान है। इस तरह होर्मुज संकट के बीच भारत ऊर्जा आपूर्ति के लिए समुद्री मार्गों पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक व्यवस्था तैयार करने की दिशा में इस परियोजना को आगे बढ़ा रहा है।
