रेफरेंडम की राह में अभी कई अड़चनें
हालांकि इतने हस्ताक्षर जुटा लेना अंतिम मंजूरी नहीं है। अब इन हस्ताक्षरों की जांच चुनाव आयोग करेगा। इसके अलावा कानूनी अड़चनें भी मौजूद हैं, जिनकी वजह से फिलहाल प्रक्रिया पर अदालत की रोक भी लगी हुई है।अगर सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं, तो प्रस्तावित जनमत संग्रह 19 अक्टूबर को कराया जा सकता है, जिसमें अलगाव के मुद्दे पर भी मतदान संभव है।
क्या पूछे जाएंगे सवाल?
अगर वोटिंग होती है, तो जनता से पूछा जाएगा कि क्या अल्बर्टा को कनाडा से अलग होकर एक स्वतंत्र देश बनना चाहिए। लेकिन मौजूदा सर्वे बताते हैं कि अभी सिर्फ करीब 30% लोग ही अलग देश बनने के पक्ष में हैं।
आर्थिक और राजनीतिक नाराजगी बनी वजह
अल्बर्टा लंबे समय से कनाडा सरकार से असंतुष्ट रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण हैं
तेल और गैस से भारी कमाई के बावजूद कम लाभ मिलने की शिकायत
टैक्स और संसाधनों के फैसलों पर ओटावा (केंद्र सरकार) का नियंत्रण
पर्यावरण नियमों को लेकर टकराव
अलग राजनीतिक और सांस्कृतिक पहचान की भावनाअल्बर्टा कनाडा के कुल तेल उत्पादन का बड़ा हिस्सा (लगभग 84%) देता है, जिससे वहां अलगाव की भावना और मजबूत होती गई है।
सरकार का रुख अलग
अल्बर्टा की प्रीमियर डेनिएल स्मिथ ने कहा है कि यदि कानूनी रूप से आवश्यक हस्ताक्षर पूरे होते हैं, तो वे जनमत संग्रह की अनुमति देंगी, लेकिन वह स्वयं अलग देश बनने के पक्ष में नहीं हैं।
अमेरिका से जुड़ते आरोप और चर्चा
कुछ रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया गया है कि अमेरिका में कुछ राजनीतिक समूह अल्बर्टा के अलगाववादी नेताओं से संपर्क में हैं। यहां तक कि कुछ लोग इसे अमेरिका का 51वां राज्य बनाने की भी बात कर रहे हैं, हालांकि यह विचार आधिकारिक नहीं है।
कनाडा का कड़ा रुख
कनाडा में पहले भी अलगाववाद को लेकर सख्त नियम बनाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के अनुसार कोई भी प्रांत बिना स्पष्ट बहुमत और केंद्र सरकार की बातचीत के अलग नहीं हो सकता। इसके बाद 2000 में Clarity Act लागू किया गया, जिसने अलग होने की प्रक्रिया को और सख्त बना दिया।
अल्बर्टा का अलगाव आंदोलन एक बार फिर चर्चा में जरूर है, लेकिन कानूनी बाधाएं, कम जन समर्थन और केंद्र सरकार का सख्त रुख इसे एक जटिल और लंबी प्रक्रिया बना देता है।
