स्मार्टफोन और स्मार्टवॉच की कल्पना
आज स्मार्टफोन और स्मार्टवॉच हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुके हैं। लेकिन फिल्मों में इनकी कल्पना काफी पहले की जा चुकी थी। स्टार ट्रेक जैसी साइंस फिक्शन सीरीज में कम्युनिकेटर नाम का एक उपकरण दिखाया गया था जिसके जरिए लोग बिना किसी तार के एक दूसरे से बात कर सकते थे। इसका डिजाइन आज के फ्लिप फोन से काफी मिलता जुलता था। वहीं डिक ट्रेसी के किरदार को अपनी कलाई पर पहनी घड़ी से वीडियो कॉल करते हुए दिखाया गया था। उस समय यह केवल फिल्मी कल्पना थी लेकिन बाद में मोबाइल फोन और स्मार्टवॉच ने इस सोच को वास्तविकता में बदल दिया।
बिना ड्राइवर के चलने वाली कार
सेल्फ ड्राइविंग कार का विचार भी फिल्मों में काफी पहले दिखाया जा चुका था। साल 1990 में रिलीज हुई फिल्म टोटल रिकॉल में जॉनी कैब नाम की एक ऐसी टैक्सी दिखाई गई थी जिसमें कोई इंसानी ड्राइवर नहीं था। इस गाड़ी को रोबोटिक ड्राइवर चलाता था और यात्री केवल अपनी मंजिल बताते थे। उस दौर में यह तकनीक लोगों को किसी सपने जैसी लगती थी। लेकिन आज टेस्ला और गूगल जैसी कंपनियां ऑटोमेटेड ड्राइविंग तकनीक पर काम कर रही हैं। आधुनिक सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से गाड़ियों को खुद चलाने की दिशा में लगातार प्रगति हो रही है।
वीडियो कॉलिंग ने खत्म की दूरियों की दीवार
आज व्हाट्सएप इंस्टाग्राम जूम और फेसटाइम जैसे प्लेटफॉर्म के जरिए दुनिया के किसी भी कोने में बैठे व्यक्ति से आमने-सामने बात करना संभव है। लेकिन वीडियो कॉलिंग का विचार भी फिल्मों में बहुत पहले सामने आ चुका था। मेट्रोपोलिस और ब्लेड रनर जैसी फिल्मों में ऐसे उपकरण दिखाए गए थे जिनकी मदद से लोग दूर बैठे व्यक्ति को स्क्रीन पर देखकर बातचीत कर सकते थे। आज इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने इस कल्पना को हमारी रोजमर्रा की जरूरत बना दिया है।
वीआर और एआर चश्मों ने दिखाई नई दुनिया
साल 1989 में आई फिल्म बैक टू द फ्यूचर पार्ट-2 में भविष्य की ऐसी दुनिया दिखाई गई थी जहां लोग विशेष चश्मे पहनकर स्क्रीन देखते थे और कॉल जैसी सुविधाओं का इस्तेमाल करते थे। आज एप्पल विजन प्रो गूगल ग्लास और मेटा क्वेस्ट जैसे उपकरण वर्चुअल रियलिटी और ऑगमेंटेड रियलिटी का अनुभव दे रहे हैं। इन तकनीकों के जरिए लोग वास्तविक दुनिया के साथ डिजिटल दुनिया को भी देख और महसूस कर सकते हैं।
टैबलेट और आईपैड की भी हुई थी कल्पना
साल 1968 में आई फिल्म 2001 ए स्पेस ओडिसी में अंतरिक्ष यात्रियों को एक पतली इलेक्ट्रॉनिक स्क्रीन पर खबरें पढ़ते हुए दिखाया गया था। फिल्म में इस उपकरण को न्यूजपैड कहा गया था। उस समय टैबलेट जैसी डिवाइस की कल्पना भी बेहद अनोखी थी। लेकिन बाद में तकनीक विकसित हुई और टैबलेट कंप्यूटर बाजार में आ गए। एप्पल का आईपैड भी इसी तरह की आधुनिक तकनीक का बड़ा उदाहरण बना।
इन उदाहरणों से पता चलता है कि कल्पना केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहती। कई बार फिल्मकार भविष्य की उन संभावनाओं को पर्दे पर उतार देते हैं जिन्हें वास्तविकता बनने में दशकों लग जाते हैं। सिनेमा की यही दूरदर्शिता विज्ञान और तकनीक की दुनिया को नए विचार देती है। आज जो तकनीक हमें सामान्य लगती है वह कभी किसी लेखक या निर्देशक के दिमाग में जन्मी एक अनोखी कल्पना हुआ करती थी।
