“आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे” की शुरुआत
इस गाने की कहानी शुरू होती है 1961 में आई फिल्म “जब प्यार किसी से होता है” से। इस फिल्म का निर्देशन नासिर हुसैन ने किया था। फिल्म में देव आनंद, आशा पारेख और प्राण जैसे बड़े कलाकार थे। संगीत शंकर-जयकिशन ने दिया था और गीत हसरत जयपुरी और शैलेंद्र ने लिखे थे।
इसी फिल्म के लिए एक गाना रिकॉर्ड किया गया था
“आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हैं जुबान पर”
जिसे मोहम्मद रफी और सुमन कल्याणपुर ने गाया था।
देव आनंद ने किया सबसे पहला रिजेक्शन
फिल्म के लिए जब यह गाना तैयार हुआ तो संगीतकारों को इससे काफी उम्मीद थी, लेकिन जब देव आनंद ने इसे सुना तो उन्होंने इसे रिजेक्ट कर दिया।
उनका मानना था कि यह गाना उनके किरदार की गंभीरता से मेल नहीं खाता और यह स्क्रीन पर जरूरत से ज्यादा “लाउड” लगेगा।
इस वजह से गाना फिल्म से बाहर कर दिया गया।
5 साल बाद भी नहीं मिली जगह
करीब 5 साल बाद, 1966 में जब शंकर-जयकिशन फिल्म “सूरज” का संगीत बना रहे थे, तो उन्होंने इस पुरानी धुन को फिर से इस्तेमाल करने की कोशिश की।
इस बार फिल्म के हीरो राजेंद्र कुमार थे।लेकिन एक बार फिर गाने को रिजेक्ट कर दिया गया। राजेंद्र कुमार को भी लगा कि यह गाना उनके स्क्रीन इमेज से मेल नहीं खाता।
शम्मी कपूर ने बदली किस्मत
संगीतकार शंकर-जयकिशन इस गाने को लेकर निराश हो चुके थे, लेकिन 1968 में जब फिल्म “ब्रह्मचारी” बनी, तो कहानी बदल गई।जब शम्मी कपूर को यह धुन सुनाई गई तो उन्हें यह बेहद पसंद आई। उन्होंने तुरंत कहा कि यह गाना उनकी फिल्म में शामिल किया जाएगा।
रिलीज होते ही बना ब्लॉकबस्टर
फिल्म “ब्रह्मचारी” रिलीज हुई और यह गाना—
“आज कल तेरे मेरे प्यार के चर्चे हैं जुबान पर”
सीधा सुपरहिट बन गया।शम्मी कपूर और मुमताज की जोड़ी पर फिल्माया गया यह गाना इतना लोकप्रिय हुआ कि आज भी यह सदाबहार हिट माना जाता है। लोग इसे आज भी रीमिक्स और स्टेज परफॉर्मेंस में उतने ही उत्साह से सुनते हैं।
रफी साहब की अमर आवाज
मोहम्मद रफी की खासियत यह थी कि हर बड़ा अभिनेता उनकी आवाज चाहता था। शम्मी कपूर के साथ उनकी जोड़ी ने कई हिट गाने दिए। उनकी आवाज ने इस गाने को अमर बना दिया।
करियर की शुरुआत और उपलब्धियां
मोहम्मद रफी ने अपने करियर की शुरुआत पंजाबी फिल्म “गुल बलोच” से की थी। उनका पहला हिंदी गाना 1945 की फिल्म “गांव की गोरी” में आया था।अपने शानदार करियर में उन्हें6 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स1965 में पद्म श्री1977 में नेशनल अवॉर्डसे सम्मानित किया गया।
7 साल तक रिजेक्ट होने के बाद भी यह गाना भारतीय संगीत का इतिहास बन गया। यह कहानी बताती है कि असली कला समय के साथ पहचान बनाती है और सही मौका मिलने पर अमर हो जाती है।
