प्रेम चोपड़ा का बचपन शिमला में बीता। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। उनके पिता चाहते थे कि बेटा डॉक्टर या आईएएस अधिकारी बने लेकिन प्रेम चोपड़ा का मन अभिनय की दुनिया में था। मुंबई पहुंचने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि फिल्मी दुनिया में जगह बनाना आसान नहीं है। आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्होंने एक अखबार के सर्कुलेशन विभाग में नौकरी शुरू कर दी। इस नौकरी के दौरान उन्हें बंगाल उड़ीसा और बिहार जैसे इलाकों में अखबार के वितरण का काम देखना पड़ता था। उनके काम में लगातार यात्राएं शामिल थीं और महीने के करीब 20 दिन उन्हें दौरे पर रहना पड़ता था।
अभिनेता बनने का सपना हालांकि उन्होंने नौकरी के बीच भी नहीं छोड़ा। वह अपने दौरे जल्द पूरा करने की कोशिश करते थे ताकि मुंबई लौटकर फिल्म स्टूडियो के चक्कर लगा सकें। इसी संघर्ष के दौरान उनकी किस्मत ने एक दिन नया मोड़ लिया। ट्रेन में सफर करते समय एक पंजाबी फिल्म निर्माता की नजर उन पर पड़ी। निर्माता को प्रेम चोपड़ा का व्यक्तित्व पसंद आया और उन्हें फिल्म चौधरी करनैल सिंह में काम करने का मौका मिल गया। यह उनकी पहली फिल्म थी और बताया जाता है कि इसके लिए उन्हें 2500 रुपये मिले थे। फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला और प्रेम चोपड़ा के अभिनय सफर की शुरुआत हो गई।
हिंदी फिल्मों में उनका डेब्यू 1960 में मुड़ मुड़ के ना देख से हुआ। शुरुआती दौर में वह मुख्य रूप से अभिनेता के तौर पर अपनी जगह बनाने की कोशिश करते रहे। इसके बाद 1964 में आई फिल्म वो कौन थी में उन्होंने नकारात्मक किरदार निभाया। फिल्म सफल रही और उनके अभिनय पर दर्शकों तथा फिल्म जगत की नजर गई। इसके बाद शहीद तीसरी मंजिल मेरा साया और उपकार जैसी फिल्मों में उनके खलनायक वाले किरदार सामने आए। उपकार के बाद प्रेम चोपड़ा को लगातार काम मिलने लगा और उन्हें महसूस हुआ कि अब वह मुंबई में अपनी जगह बना चुके हैं।
उनके करियर का सबसे यादगार पड़ाव 1973 में आई राज कपूर की फिल्म बॉबी रही। फिल्म में उनका किरदार बहुत बड़ा नहीं था लेकिन एक छोटा सा संवाद उनकी पहचान का स्थायी हिस्सा बन गया। संवाद था प्रेम नाम है मेरा प्रेम चोपड़ा। फिल्म रिलीज होने के बाद यह संवाद इतना लोकप्रिय हुआ कि प्रेम चोपड़ा का नाम ही इसके साथ जुड़ गया। आगे चलकर यही संवाद उनकी आत्मकथा के शीर्षक का हिस्सा भी बना।
प्रेम चोपड़ा ने अपने लंबे करियर में सैकड़ों फिल्मों में काम किया और अलग अलग तरह के किरदार निभाए। हालांकि दर्शकों की याद में उनकी खलनायक वाली छवि सबसे ज्यादा मजबूत रही। उनकी खास संवाद अदायगी और पर्दे पर प्रभावशाली मौजूदगी ने उन्हें हिंदी सिनेमा के यादगार कलाकारों में शामिल कर दिया। 91वें जन्मदिन पर उनके जीवन का यह सफर बताता है कि मुंबई में एक नौकरी करते हुए शुरू हुआ संघर्ष कैसे भारतीय सिनेमा की एक स्थायी पहचान में बदल गया।
