एक मुस्लिम परिवार में जन्मी मुमताज जहां देहलवी यानी मधुबाला की गुरु नानक देव जी के प्रति अटूट और अगाध श्रद्धा थी। यह आस्था उनके जीवन के उस दौर में शुरू हुई जब वे व्यक्तिगत जीवन की परेशानियों से काफी विचलित थीं। एक परिचित के सुझाव पर जब वे अंधेरी गुरुद्वारे पहुंचीं, तो वहां के ग्रंथि ने उन्हें नियमित रूप से जपजी साहिब का पाठ करने की सलाह दी। गुरमुखी लिपि न आने के कारण उन्होंने फारसी भाषा में छपी जपजी साहिब की प्रति मंगवाई और जीवन के अंतिम समय तक उसका नित्य पाठ करती रहीं।
संगीत जगत के पुराने दिग्गजों के अनुसार, मधुबाला शूटिंग के दौरान भी खाली समय मिलते ही अपना सिर ढककर इस पवित्र पाठ का अध्ययन किया करती थीं। उनका मानना था कि इस पाठ को करने से उन्हें आंतरिक शांति और संबल मिलता है। गुरु नानक देव जी के प्रति उनकी दीवानगी का आलम यह था कि वे किसी भी फिल्म को साइन करने से पहले निर्माताओं के साथ होने वाले अनुबंध में यह शर्त स्पष्ट रूप से शामिल करवाती थीं कि गुरुपर्व के दिन वे मुंबई के अंधेरी गुरुद्वारे में उपस्थित रहेंगी।
वर्ष 1969 में अपने निधन से कुछ वर्ष पूर्व मधुबाला ने गुरु पर्व पर लंगर सेवा का संपूर्ण खर्च उठाने की इच्छा व्यक्त की थी। उन्होंने गुरुद्वारा समिति को इसके लिए आवश्यक सहयोग राशि प्रदान की थी। उनके निधन के बाद भी कई वर्षों तक उनके परिवार ने इस परंपरा को जारी रखा। बाद में गुरुद्वारा प्रबंध समिति और श्रद्धालुओं ने फैसला किया कि भले ही अभिनेत्री अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनकी अटूट श्रद्धा का सम्मान करते हुए हर साल गुरुपर्व पर लंगर सेवा के दौरान उनके नाम की अरदास की जाएगी।
मध्य प्रदेश और देश भर के सिनेमा प्रेमी मधुबाला को न केवल उनकी अमर फिल्मों और अभिनय के लिए याद करते हैं, बल्कि उनकी इस अनूठी भक्ति भावना की भी सराहना करते हैं। अंधेरी गुरुद्वारे में आज भी हर गुरुपर्व पर अरदास के दौरान यह पंक्तियां दोहराई जाती हैं कि ईश्वर अपनी इस समर्पित बेटी की ओर से लंगर-प्रसाद की सेवा स्वीकार करे और उसे अपने चरणों में स्थान दे।
