नई दिल्ली । सोने की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी और सरकार की ओर से आयात शुल्क में वृद्धि के बावजूद ज्वेलरी सेक्टर से जुड़ी प्रमुख कंपनियों के शेयरों को लेकर बाजार में सकारात्मक रुख बना हुआ है। आम तौर पर माना जाता है कि सोना महंगा होने पर आभूषणों की मांग पर दबाव पड़ता है, लेकिन इस बार स्थिति थोड़ी अलग दिखाई दे रही है। निवेशकों और ब्रोकरेज हाउसेस का ध्यान विशेष रूप से टाइटन और सेनको जैसी संगठित कंपनियों पर केंद्रित है, जिनमें आगे चलकर 15 से 17 प्रतिशत तक तेजी की संभावना जताई जा रही है।
हाल ही में सरकार ने सोने पर आयात शुल्क बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया है, जिससे उद्योग जगत में चिंता का माहौल था। आशंका जताई गई थी कि इससे सोने की कीमतें और बढ़ेंगी, जिसका सीधा असर ग्राहकों की खरीदारी पर पड़ सकता है। लेकिन इसके बावजूद बाजार के बड़े विश्लेषकों का मानना है कि संगठित ज्वेलरी कंपनियों की स्थिति मजबूत बनी हुई है और मांग में उम्मीद से कम गिरावट देखने को मिल रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में सोने की कीमतों में तेज उतार-चढ़ाव के बावजूद ग्राहकों का रुझान पूरी तरह से कमजोर नहीं हुआ है। वित्त वर्ष 2026 में टाइटन के ज्वेलरी कारोबार में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है, जहां बिक्री और परिचालन मुनाफे दोनों में मजबूत सुधार देखा गया है। इसी तरह सेनको ने भी अपने प्रदर्शन में स्थिरता दिखाई है, जिससे निवेशकों का भरोसा बढ़ा है।
बाजार विश्लेषण में यह भी सामने आया है कि अब ज्वेलरी कंपनियां उपभोक्ताओं की बदलती जरूरतों के अनुसार रणनीति अपना रही हैं। भारी गहनों की बजाय हल्के वजन वाले डिजाइन पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है। इससे ग्राहकों के लिए खरीदारी आसान हो जाती है और कीमतों का बोझ भी अपेक्षाकृत कम रहता है। यही कारण है कि महंगे सोने के बावजूद मांग पूरी तरह से प्रभावित नहीं हो रही है।
इसके अलावा संगठित ज्वेलरी कंपनियों को पारदर्शी प्रणाली और ब्रांड वैल्यू का लाभ मिल रहा है। बाजार में अब बीआईएस हॉलमार्किंग और अन्य नियामक व्यवस्थाओं के कारण असंगठित कारोबार की तुलना में संगठित कंपनियों की पकड़ मजबूत हुई है। इससे ग्राहकों का भरोसा इन ब्रांड्स पर बढ़ा है और निवेशकों के लिए भी यह सेक्टर आकर्षक बना हुआ है।
हालांकि, आयात शुल्क बढ़ने के बाद सोने की तस्करी को लेकर चिंता भी जताई जा रही है, लेकिन इस बार सख्त निगरानी व्यवस्था के चलते स्थिति पहले जैसी नहीं मानी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि पारदर्शिता बढ़ने से संगठित कंपनियों को फायदा होगा, जबकि असंगठित बाजार पर दबाव बढ़ सकता है।
