दस्तावेज के अनुसार, शिपरॉकेट के खिलाफ चार आपराधिक मामले लंबित हैं। इन मामलों में कुल दावा राशि 5.39 करोड़ रुपये बताई गई है। इसके अलावा कंपनी के खिलाफ दो अन्य आपराधिक कार्यवाहियां और सात कर विवाद भी चल रहे हैं। सहयोगी कंपनियों के स्तर पर भी एक आपराधिक मामला और तीन कर संबंधी मामले लंबित हैं, जिनमें कुल दावा राशि 2.34 करोड़ रुपये बताई गई है।
कंपनी के सामने मौजूद मामलों में वर्ष 2022 का एक प्रमुख मामला भी शामिल है। इसमें शिपरॉकेट के सह-संस्थापक साहिल गोयल और गौतम कपूर, निदेशक अर्जुन सेठी तथा मुख्य वित्तीय अधिकारी कुमार तनमय को नामजद किया गया है। मामले में धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात, जालसाजी और आपराधिक साजिश जैसे आरोप लगाए गए हैं। यह मामला अभी न्यायिक प्रक्रिया में है और इस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ है।
वित्तीय प्रदर्शन की बात करें तो शिपरॉकेट अभी लाभ में नहीं आई है। वित्त वर्ष 2025-26 में कंपनी का शुद्ध घाटा 79.2 करोड़ रुपये रहा। इससे पिछले वित्त वर्ष में घाटा 74.4 करोड़ रुपये था। हालांकि वित्त वर्ष 2023-24 में दर्ज 595.1 करोड़ रुपये के घाटे की तुलना में कंपनी की वित्तीय स्थिति में काफी सुधार हुआ है।
राजस्व के मोर्चे पर कंपनी ने लगातार वृद्धि दर्ज की है। वित्त वर्ष 2025-26 में परिचालन से प्राप्त आय 24 प्रतिशत बढ़कर 2024.1 करोड़ रुपये हो गई। राजस्व में यह वृद्धि कंपनी के कारोबार के विस्तार का संकेत देती है, लेकिन बढ़ती आय के बावजूद लाभप्रदता हासिल करना अभी भी प्रबंधन के लिए महत्वपूर्ण चुनौती है।
कंपनी के अनुसार, व्यापारियों का आधार बढ़ाने, नए उत्पाद विकसित करने, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस क्षमताओं में निवेश करने और नए कारोबारी क्षेत्रों का विस्तार करने पर खर्च निकट भविष्य में मुनाफे पर दबाव बनाए रख सकता है। ऐसे निवेश कंपनी की दीर्घकालिक वृद्धि के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इनके कारण तत्काल लाभ में सुधार सीमित रह सकता है।
शिपरॉकेट की एक अन्य महत्वपूर्ण निर्भरता तीसरे पक्ष के सेवा प्रदाताओं पर है। वित्त वर्ष 2025-26 में मर्चेंट सॉल्यूशन लागत कंपनी के कुल खर्च का लगभग 69.4 प्रतिशत रही। इस खर्च में शीर्ष 10 विक्रेताओं की हिस्सेदारी 55 प्रतिशत से अधिक थी। इससे कुछ प्रमुख सेवा प्रदाताओं पर कंपनी की निर्भरता का जोखिम सामने आता है।
कंपनी ने यह भी बताया है कि उसके अधिकांश लॉजिस्टिक्स साझेदारों के साथ विशेष समझौते नहीं हैं। ऐसी स्थिति में किसी साझेदार के साथ कारोबारी संबंध प्रभावित होने पर सेवा व्यवस्था, लागत और परिचालन क्षमता पर असर पड़ सकता है। बढ़ती परिचालन लागत और प्रतिस्पर्धी प्लेटफॉर्मों द्वारा बेहतर शर्तें दिए जाने की स्थिति भी कंपनी के लिए चुनौती बन सकती है।
ई-कॉमर्स लॉजिस्टिक्स क्षेत्र में शिपरॉकेट को मार्केटप्लेस, लॉजिस्टिक्स कंपनियों और तकनीकी एग्रीगेटर्स से प्रतिस्पर्धा मिलती है। कंपनी घरेलू बाजार के साथ क्रॉस-बॉर्डर ई-कॉमर्स कारोबार का विस्तार करना चाहती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में अवसर अधिक हैं, लेकिन वहां नियामकीय आवश्यकताओं, लागत, संचालन और प्रतिस्पर्धा से जुड़े अतिरिक्त जोखिम भी मौजूद हैं।
ऐसे में प्रस्तावित आईपीओ से पहले निवेशकों के लिए कंपनी की बढ़ती आय के साथ उसके घाटे, लंबित कानूनी मामलों, सेवा प्रदाताओं पर निर्भरता और विस्तार संबंधी खर्चों को समझना महत्वपूर्ण होगा। कंपनी की आगे की रणनीति का मुख्य लक्ष्य कारोबार बढ़ाने के साथ लाभप्रदता और परिचालन स्थिरता हासिल करना रहेगा।
