वर्तमान सीजन में भी पराली जलाने की घटनाएं सामने आ रही हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, 15 सितंबर से 15 अक्टूबर 2026 के बीच मध्य प्रदेश में 350 घटनाएं दर्ज की गईं। यह आंकड़ा फसल कटाई के बाद खेतों में बचे अवशेषों के निपटान से जुड़ी चुनौती को दर्शाता है। यदि खेतों में बचे अवशेषों को जलाने के बजाय उनके प्रबंधन के प्रभावी उपाय उपलब्ध नहीं होते, तो ऐसी घटनाओं पर नियंत्रण करना मुश्किल हो सकता है।
राज्यवार आंकड़ों में मध्य प्रदेश के साथ उत्तर प्रदेश और राजस्थान में भी पराली जलाने के मामलों में बढ़ोतरी दिखाई देती है। उत्तर प्रदेश में वर्ष 2024 में 5,769 घटनाएं दर्ज की गई थीं, जो 2025 में बढ़कर 7,290 हो गईं। राजस्थान में भी इनकी संख्या 2024 के 2,762 मामलों से बढ़कर 2025 में 2,890 हो गई।
इसके विपरीत, पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने की घटनाओं में कमी दर्ज की गई। पंजाब में वर्ष 2021 में 71,304 मामले सामने आए थे, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 5,114 रह गई। हरियाणा में भी 2021 के 6,984 मामलों की तुलना में 2025 में 662 घटनाएं दर्ज की गईं। इन आंकड़ों से अलग-अलग राज्यों में पराली प्रबंधन की स्थिति में आए बदलाव का पता चलता है।
देशभर में पराली जलाने की कुल घटनाओं में भी पिछले वर्षों के मुकाबले कमी आई है। वर्ष 2021 में कुल 92,407 मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2022 में यह संख्या घटकर 56,157 और 2023 में 57,242 रही। वर्ष 2024 में कुल 36,893 मामले सामने आए, जबकि 2025 में यह संख्या घटकर 33,028 हो गई। इसके बावजूद मध्य प्रदेश में बढ़ते मामले राज्य के लिए चुनौती बने हुए हैं।
पराली जलाने से निकलने वाला धुआं वातावरण में प्रदूषक कणों की मात्रा बढ़ा सकता है। सर्दियों में जब धुआं और कोहरा एक साथ मौजूद रहते हैं, तो स्मॉग की स्थिति बन सकती है। इससे वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है और सांस लेने में परेशानी बढ़ सकती है। कई क्षेत्रों में प्रदूषण का स्तर खराब या बहुत खराब श्रेणी तक पहुंचने की आशंका रहती है, हालांकि इसका वास्तविक स्तर स्थान और मौसम की परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषित हवा के लंबे समय तक संपर्क में रहने से श्वसन तंत्र प्रभावित हो सकता है। सांस की एलर्जी, अस्थमा और फेफड़ों से संबंधित समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए धुएं के संपर्क में आना विशेष रूप से नुकसानदेह हो सकता है। लंबे समय तक वायु प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों की कार्यक्षमता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, फेफड़ों की कार्यक्षमता में किसी निश्चित प्रतिशत की कमी या अस्पतालों में मरीजों की संख्या बढ़ने का आकलन करने के लिए संबंधित अध्ययन और स्वास्थ्य आंकड़ों की पुष्टि आवश्यक है।
पराली जलाने पर रोक लगाने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई, जुर्माने और जागरूकता संबंधी प्रयास किए जाते हैं। लेकिन किसानों को फसल अवशेषों के निपटान के लिए किफायती और व्यावहारिक विकल्प उपलब्ध कराना भी जरूरी है। खेतों में बचे अवशेषों का उपयोग और उनका उचित प्रबंधन पराली जलाने की घटनाओं को कम करने में मदद कर सकता है। मध्य प्रदेश में बढ़ते मामलों को देखते हुए प्रभावी रोकथाम और किसानों के लिए उपलब्ध विकल्पों पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।
