मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने शुक्रवार को मामले पर तत्काल सुनवाई की। पीठ में न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना भी शामिल थे। अदालत ने याचिका में सामने आए तथ्यों को चिंताजनक बताया। यह मामला एसिड अटैक पीड़ितों के पुनर्वास और कल्याण के लिए काम करने वाले संगठन ब्रेव सोल्स फाउंडेशन की ओर से उठाया गया था। संगठन की प्रमुख शाहीन मलिक के मुताबिक, महिला पर छह अक्टूबर को दिल्ली के भजनपुरा इलाके में एसिड अटैक हुआ था। इस हमले में वह लगभग 45 प्रतिशत तक झुलस गई थी।
शाहीन मलिक ने अदालत को बताया कि कानून के तहत मुफ्त इलाज का अधिकार होने के बावजूद महिला को दिल्ली के बड़े निजी अस्पतालों में पर्याप्त उपचार नहीं मिल पा रहा था। उनके आरोप के मुताबिक, सर गंगा राम अस्पताल और अपोलो अस्पताल ने बर्न वार्ड की सुविधा उपलब्ध नहीं होने का हवाला देकर इलाज से इनकार किया था। पीड़िता को इलाज के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाना पड़ा। इस स्थिति के बाद संगठन ने मामले में हस्तक्षेप किया और पीड़िता के उपचार के लिए न्यायिक मदद मांगी।
पीड़िता की मां के अनुसार, हमले के बाद पुलिस कंट्रोल रूम की मदद से उनकी बेटी को सबसे पहले जग प्रवेश चंद्र अस्पताल ले जाया गया। वहां से उसे गुरु तेग बहादुर अस्पताल भेज दिया गया। मां ने बताया कि बेटी को दर्द से जूझते देखना उनके लिए बेहद मुश्किल था और उन्हें लगा कि उसकी परेशानी पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा। उनके मुताबिक, गुरुवार दोपहर बेटी को गुरु तेग बहादुर अस्पताल से छुट्टी दिलाकर सर गंगा राम अस्पताल ले जाया गया। इसके बाद परिवार को उसके इलाज को लेकर लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ा।
मां ने आरोप लगाया कि शुक्रवार रात सर गंगा राम अस्पताल के कर्मचारियों ने परिवार से बाहर से दवाएं खरीदने को कहा। जब उन्होंने बताया कि उनके पास दवाएं खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं, तो शनिवार सुबह उन्हें बेटी को किसी दूसरे अस्पताल ले जाने के लिए कहा गया। हालांकि, गुरु तेग बहादुर अस्पताल के अतिरिक्त निदेशक डॉ. प्रवीण कुमार ने वहां इलाज में लापरवाही के आरोपों से इनकार किया। उन्होंने कहा कि अस्पताल ने मरीज की जरूरत के अनुसार पूरा उपचार दिया था। उनके मुताबिक, परिवार अपनी पसंद के अस्पताल में इलाज कराना चाहता था, इसलिए मरीज को वहां से छुट्टी दिलाई गई।
याचिका में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 397 का हवाला दिया गया है। इस प्रावधान के तहत सरकारी और निजी अस्पतालों को एसिड अटैक पीड़ितों को तत्काल प्राथमिक चिकित्सा और मुफ्त उपचार उपलब्ध कराना होता है। शाहीन मलिक ने कहा कि पीड़िता और उसके परिवार को इलाज के लिए कई अस्पतालों के चक्कर नहीं लगाने चाहिए थे। उन्होंने एसिड पर प्रतिबंध के बावजूद राष्ट्रीय राजधानी में इसकी बिक्री जारी रहने पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि पीड़िता को इलाज दिलाने के लिए संगठन और वकीलों को हस्तक्षेप करना पड़ा तथा सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
