अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड ऐसे औद्योगिक तरीके से तैयार खाद्य पदार्थ होते हैं, जिनमें कई तरह के एडिटिव्स का इस्तेमाल किया जाता है। इनमें अक्सर कैलोरी, नमक, चीनी और अस्वास्थ्यकर वसा की मात्रा अधिक हो सकती है, जबकि फाइबर और जरूरी पोषक तत्व अपेक्षाकृत कम होते हैं। कम उम्र में ही ऐसी चीजें खाने की आदत पड़ने से समय से पहले वजन बढ़ने और अन्य स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है। नियमित रूप से अधिक मात्रा में इन खाद्य पदार्थों का सेवन शरीर में जरूरत से ज्यादा कैलोरी पहुंचा सकता है, जिससे मोटापे की समस्या बढ़ सकती है।
इन खाद्य पदार्थों में मौजूद अधिक चीनी और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट भी चिंता का विषय हो सकते हैं। इन्हें बार-बार खाने से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ सकता है। लंबे समय तक ऐसी डाइट लेने पर इंसुलिन रेजिस्टेंस और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा बढ़ सकता है। इसी तरह ज्यादा नमक, संतृप्त वसा और कैलोरी का सेवन ब्लड प्रेशर, वजन और कोलेस्ट्रॉल से जुड़े जोखिमों को बढ़ा सकता है। इन कारणों से अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का अधिक सेवन हृदय स्वास्थ्य के लिए भी नुकसानदायक हो सकता है।
फाइबर की कमी भी इन खाद्य पदार्थों से जुड़ी एक महत्वपूर्ण समस्या है। शरीर और आंतों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए फाइबर जरूरी माना जाता है। लंबे समय तक फाइबर वाली चीजों का सेवन कम रहने पर पाचन संबंधी दिक्कतें हो सकती हैं। अध्ययनों में अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड के अधिक सेवन को मोटापा, टाइप-2 डायबिटीज और हृदय रोग सहित कई क्रॉनिक बीमारियों के बढ़ते खतरे से जोड़ा गया है। कुछ अध्ययनों में इसके सेवन और कैंसर के खतरे के बीच भी संबंध पाया गया है।
ऐसे में पैकेट वाली चीजें खरीदते समय उनके लेबल को ध्यान से देखना जरूरी है। नमक, चीनी, संतृप्त वसा और फाइबर की मात्रा की जांच करके बेहतर विकल्प चुना जा सकता है। रोजमर्रा की डाइट में फल, सब्जियां, दालें, साबुत अनाज और नट्स जैसी पौष्टिक चीजों की मात्रा बढ़ाना भी उपयोगी हो सकता है। पैकेट वाले खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन कम करके और संतुलित आहार को प्राथमिकता देकर डाइट को अधिक पौष्टिक बनाया जा सकता है।
