जांच रिपोर्ट में पुराने पेयजल और सीवरेज नेटवर्क की स्थिति पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आयोग के सामने पुराने जल और सीवर नेटवर्क से जुड़े कई महत्वपूर्ण तकनीकी रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए जा सके। इनमें नक्शे अलाइनमेंट प्लान इंजीनियरिंग डिजाइन वर्क ऑर्डर और निरीक्षण से जुड़े दस्तावेज शामिल बताए गए हैं। आयोग ने इन रिकॉर्ड के गायब होने के कारणों की अलग से जांच की जरूरत भी बताई है। रिपोर्ट के मुताबिक पुराने नेटवर्क की निगरानी और रखरखाव में कमियां थीं और संवेदनशील पाइपलाइन को समय पर बदलने की प्रक्रिया भी आगे नहीं बढ़ सकी।
सिंघार ने फाइल मूवमेंट का मुद्दा उठाते हुए कहा कि पाइपलाइन बदलने से जुड़ी फाइल लंबे समय तक लंबित रही। उन्होंने सवाल किया कि जरूरी काम से जुड़ी फाइल इतनी लंबी अवधि तक क्यों रुकी रही। हालांकि न्यायिक जांच की रिपोर्ट में जिम्मेदारी तय करने का आधार केवल किसी फाइल के मेयर के पास लंबित रहने को नहीं बनाया गया है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि टेंडर प्रक्रिया में एक चरण पर 10 दिन की अस्पष्ट देरी हुई थी और इस देरी के लिए कुछ अधिकारियों की भूमिका पर जिम्मेदारी तय की गई।
आयोग ने पूर्व नगर निगम आयुक्तों में से कुछ अधिकारियों को जिम्मेदारी से मुक्त किया है जबकि तत्कालीन अतिरिक्त आयुक्तों और कार्यपालन यंत्री से जुड़े स्तर पर प्रशासनिक चूक को लेकर टिप्पणियां की गई हैं। रिपोर्ट के अनुसार टेंडर की अंतिम स्वीकृति से जुड़े अधिकार संबंधित अतिरिक्त आयुक्त के स्तर पर थे। इसी आधार पर तत्कालीन नगर निगम आयुक्त को उस देरी के लिए जिम्मेदार नहीं माना गया। यह निष्कर्ष उन राजनीतिक आरोपों से अलग है जिनमें जनप्रतिनिधियों या शीर्ष प्रशासनिक पदों की जवाबदेही का सवाल उठाया गया है।
भागीरथपुरा में दूषित पानी की समस्या सामने आने के बाद पुराने पाइप नेटवर्क को बदलने का काम शुरू किया गया था। शुरुआती दौर में प्रशासन और स्थानीय लोगों की ओर से मौतों की संख्या को लेकर अलग अलग आंकड़े सामने आए थे। फरवरी में विधानसभा में सरकार की ओर से भी मौतों के आंकड़े को लेकर आधिकारिक जानकारी दी गई थी जबकि विपक्ष और स्थानीय लोगों ने इससे अधिक मौतों का दावा किया था। बाद में न्यायिक जांच ने 36 मौतों के मामलों की परिस्थितियों की समीक्षा की।
जांच रिपोर्ट का व्यापक संकेत यह है कि त्रासदी को किसी एक दिन की घटना के बजाय लंबे समय से चली आ रही तकनीकी कमियों पाइपलाइन की स्थिति रखरखाव निगरानी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के संदर्भ में देखा गया है। रिपोर्ट में जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई और प्रभावित परिवारों को राहत देने से जुड़े सुझाव भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में अब मुख्य सवाल यह है कि सरकार आयोग की सिफारिशों पर किस तरह आगे बढ़ती है और प्रभावित परिवारों को राहत कब तक मिलती है।
सिंघार ने सरकार से इसी आधार पर जवाबदेही तय करने की मांग की है। वहीं उपलब्ध न्यायिक जांच रिपोर्ट में निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय मुख्य टिप्पणियां अधिकारियों तकनीकी व्यवस्था पाइपलाइन रखरखाव और प्रक्रिया में हुई देरी से संबंधित हैं।
