बरेली से हर साल करीब 1450 करोड़ रुपये का कारोबार होता है। इसमें अकेले खाड़ी देशों को होने वाला लगभग 100 करोड़ रुपये का जरी-जरदोजी निर्यात शामिल है। शहर का फर्नीचर और बांस से तैयार सामान भी विदेशी बाजारों में अपनी जगह बना चुका है। हालांकि, स्थानीय कारोबारियों के सामने अब तक सबसे बड़ी चुनौती प्रत्यक्ष निर्यात की सुविधा की रही है। बड़ी मात्रा में माल दिल्ली के कारोबारियों के माध्यम से विदेश भेजा जाता है।
ब्रिक्स करार से कारोबारियों को सीधे बाजार तक पहुंच की उम्मीद
राष्ट्रीय व्यापार कल्याण बोर्ड के सदस्य राजेंद्र गुप्ता के मुताबिक, ब्रिक्स देशों के साथ हुए नए व्यापारिक करारों से स्थानीय कारोबारियों के लिए कारोबार का दायरा बढ़ने की उम्मीद है। इससे बरेली के पारंपरिक उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से सीधे जुड़ने के अवसर मिल सकते हैं।
जरी-जरदोजी बरेली की पहचान से जुड़े प्रमुख पारंपरिक उद्योगों में शामिल है। खाड़ी देशों में इसकी मांग पहले से है। ऐसे में व्यापारिक संबंधों में सुधार होने से निर्यातकों को नए खरीदार और बाजार मिलने की संभावना है।
मेंथा तेल और फूड फ्लेवर का 1200 करोड़ का निर्यात
बरेली मंडल के लिए मेंथा कारोबार भी निर्यात की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यहां से खाड़ी देशों और इस्राइल को मेंथा एसेंशियल ऑयल और फूड फ्लेवर का बड़े पैमाने पर निर्यात किया जाता है। इसका कारोबार लगभग 1200 करोड़ रुपये का है। खाड़ी देशों में इन उत्पादों का इस्तेमाल परफ्यूम, शैंपू, क्रीम और अलग-अलग खाद्य पदार्थों में किया जाता है।
व्यापारिक संबंधों में विस्तार से इस क्षेत्र के निर्यातकों को भी नए अवसर मिलने की उम्मीद है। स्थानीय कारोबारी मानते हैं कि अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच आसान होने से पारंपरिक और कृषि आधारित उत्पादों का कारोबार बढ़ सकता है।
6 लाख टन चावल उत्पादन, खाड़ी देशों में ब्रांड की मांग
बरेली जिले में हर साल करीब 6 लाख टन चावल का उत्पादन होता है। यहां के कई चावल ब्रांड सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान जैसे देशों में लोकप्रिय हैं। बरेली मंडल को चावल उत्पादन और निर्यात क्लस्टर के रूप में विकसित किया जा रहा है।
मंडल से बासमती और गैर-बासमती चावल देश के बड़े बंदरगाहों के जरिये विदेशी बाजारों तक पहुंचता है। ब्रिक्स देशों के साथ बेहतर व्यापारिक संबंधों से इस क्लस्टर को और विस्तार मिलने की उम्मीद है। कारोबारियों के मुताबिक, निर्यात के नए अवसर मिलने से स्थानीय उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय पहचान और मजबूत हो सकती है।
ODOP के तहत बांस और फर्नीचर की विदेशों में मांग
‘एक जिला, एक उत्पाद’ यानी ओडीओपी योजना के तहत बांस के उत्पाद और फर्नीचर भी विदेशी खरीदारों का ध्यान खींच रहे हैं। फर्नीचर कारोबारी सौरभ गर्ग के मुताबिक, बांस से बने घर सजाने के सामान के अलावा सोफे, टेबल और कुर्सियों की विदेशों में अच्छी मांग है।
उन्होंने कहा कि ब्रिक्स देशों के साथ हुए व्यापारिक समझौतों से एसेंशियल ऑयल के साथ दूसरे स्थानीय उत्पादों के लिए भी निर्यात के नए रास्ते खुल सकते हैं। बरेली में बड़े पैमाने पर फर्नीचर का उत्पादन होता है, लेकिन सीधे निर्यात की सुविधा नहीं होने से कारोबारियों को अभी दिल्ली के जरिये विदेशी बाजारों तक पहुंच बनानी पड़ती है।
समर्पित फर्नीचर केंद्र से मिल सकता है सीधा विदेशी ऑर्डर
कारोबारियों का कहना है कि बरेली में यदि समर्पित फर्नीचर केंद्र विकसित होता है तो स्थानीय इकाइयों को विदेशी खरीदारों से सीधे ऑर्डर मिलने की संभावना बढ़ेगी। इससे बिचौलियों पर निर्भरता कम हो सकती है और कारोबारियों की आय में भी बढ़ोतरी हो सकती है।
ब्रिक्स सम्मेलन के बाद बरेली के कारोबारी अब व्यापारिक करारों के जमीनी स्तर पर लागू होने और निर्यात सुविधाओं के विस्तार की उम्मीद लगाए हैं। जरी-जरदोजी से लेकर फर्नीचर, बांस उत्पाद, मेंथा और चावल तक स्थानीय उत्पादों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में विस्तार की संभावनाएं कारोबारियों के उत्साह को बढ़ा रही हैं।
