वंदेमातरम को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने रचा था। यह रचना बाद में उनके प्रसिद्ध उपन्यास आनंदमठ का हिस्सा बनी। स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में इस गीत ने लोगों के भीतर राष्ट्रभावना जगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 1896 के कांग्रेस अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर द्वारा इसके गायन का उल्लेख भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में मिलता है। आगे चलकर वंदेमातरम स्वतंत्रता सेनानियों और राष्ट्रवादी आंदोलनों के बीच एक लोकप्रिय उद्घोष और प्रेरणा का माध्यम बन गया।
विवाद मुख्य रूप से उस समय गहरा हुआ जब वंदेमातरम के कुछ हिस्सों के गायन को लेकर आपत्तियां सामने आने लगीं। 1930 के दशक में कांग्रेस के भीतर इस विषय पर गंभीर चर्चा हुई। उस समय देश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ रहा था और कांग्रेस के सामने अलग अलग समुदायों को साथ लेकर स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाने की चुनौती थी। इसी पृष्ठभूमि में वंदेमातरम के गायन और इसके चयनित हिस्सों को लेकर निर्णय लिया गया। समर्थकों का तर्क रहा कि इससे गीत की मूल भावना प्रभावित हुई जबकि कांग्रेस के तत्कालीन नेताओं की ओर से इसे राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियों से जोड़कर देखा गया।
आजादी के बाद भी वंदेमातरम को लेकर बहस पूरी तरह खत्म नहीं हुई। राष्ट्रगान जन गण मन और राष्ट्रगीत वंदेमातरम को लेकर संवैधानिक और राष्ट्रीय परंपराओं में अलग अलग भूमिकाएं निर्धारित हुईं। इसके बावजूद समय समय पर वंदेमातरम के पूर्ण गायन और इसके सम्मान को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आते रहे हैं। मौजूदा विवाद भी इसी लंबी पृष्ठभूमि से जुड़ा हुआ है।
इस मुद्दे पर कांग्रेस नेताओं की ओर से सामने आए बयानों और कार्यक्रमों को लेकर सत्तारूढ़ दल तथा उसके समर्थकों ने सवाल उठाए हैं। आलोचकों का आरोप है कि कांग्रेस का रुख ऐतिहासिक रूप से वोट बैंक की राजनीति से प्रभावित रहा है। दूसरी ओर कांग्रेस की ओर से ऐसे आरोपों को राजनीतिक प्रचार का हिस्सा बताया जाता रहा है। इसलिए इस विवाद को केवल एक राजनीतिक आरोप के आधार पर समझने के बजाय इसके ऐतिहासिक संदर्भ को देखना जरूरी है।
समाजवादी पार्टी सहित कुछ विपक्षी नेताओं ने भी वंदेमातरम के स्वरूप और इसके पूर्ण गायन को लेकर अलग राय रखी है। कुछ नेताओं का कहना है कि वर्तमान राजनीतिक बहस में राष्ट्रगीत के इतिहास और उसके मूल स्वरूप को समझने के बजाय इसे राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है। इससे साफ है कि वंदेमातरम अब केवल सांस्कृतिक या ऐतिहासिक विषय नहीं रहा बल्कि भारतीय राजनीति में विचारधाराओं के टकराव का प्रतीक भी बन चुका है।
वंदेमातरम की मूल भावना देश को मां के रूप में देखने और उसके प्रति समर्पण की भावना से जुड़ी रही है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान इस भावना ने लाखों लोगों को प्रेरित किया। यही वजह है कि इसके समर्थक इसे केवल एक गीत नहीं बल्कि राष्ट्रीय चेतना की ऐतिहासिक विरासत मानते हैं। वहीं दूसरी ओर कुछ समुदायों और राजनीतिक समूहों ने इसके कुछ धार्मिक संदर्भों को लेकर समय समय पर अपनी आपत्तियां जाहिर की हैं।
आज जब वंदेमातरम फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में है तो सबसे जरूरी सवाल यह है कि राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान और लोकतांत्रिक असहमति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। राष्ट्रगीत के प्रति सम्मान को लेकर कोई विवाद नहीं होना चाहिए लेकिन इसके इतिहास और राजनीतिक इस्तेमाल पर बहस लोकतांत्रिक तरीके से हो सकती है। मौजूदा विवाद ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े प्रतीक आज भी भारतीय राजनीति और समाज में कितने प्रभावशाली हैं। वंदेमातरम को लेकर जारी बहस आने वाले दिनों में भी राजनीतिक मंचों पर दिखाई दे सकती है और इसके साथ 1937 के ऐतिहासिक फैसलों से लेकर वर्तमान राजनीति तक के कई पुराने अध्याय फिर चर्चा में आने की संभावना है।
