प्रत्यक्षदर्शियों और स्थानीय नागरिकों के अनुसार, पौधारोपण स्थल पर नीम, शीशम और गूलर जैसे पर्यावरण के लिए बेहद उपयोगी और घने पेड़ पहले से मौजूद थे। कटाई के बाद वहां केवल कटे हुए पेड़ों के ठूंठ ही दिखाई दे रहे हैं, जबकि बेशकीमती लकड़ियों को रातों-रात हटा दिया गया। इस मनमानी से आक्रोशित क्षेत्रवासियों ने पर्यावरण संरक्षण के नाम पर हो रहे इस नुकसान का जमकर विरोध किया और प्रशासनिक अधिकारियों से दोषियों पर सख्त कदम उठाने की मांग की।
मामला गरमाने के बाद भोपाल नगर निगम प्रशासन ने त्वरित संज्ञान लेते हुए मौके की जांच कराई। शुरुआती जांच में संबंधित कार्य एजेंसी और ठेकेदार की घोर लापरवाही उजागर हुई, जिसके बाद ठेकेदार पर साढ़े तीन लाख रुपये का भारी जुर्माना आयद किया गया है। इसके अतिरिक्त, इस बात की भी गहनता से पड़ताल की जा रही है कि कार्य स्थल पर तैनात अधिकारियों द्वारा पर्यवेक्षण में कोई ढिलाई बरती गई थी या नहीं।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस घटना पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि नए पौधे लगाने के उत्साह में पुराने और छायादार पेड़ों को नष्ट करना किसी भी दृष्टि से तर्कसंगत नहीं है। एक परिपक्व पेड़ स्थानीय जैव विविधता, पक्षियों के आवास और क्षेत्र में ऑक्सीजन के स्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ऐसे विकसित पेड़ों को काटकर नए छोटे पौधे लगाना पर्यावरण संतुलन को लंबे समय के लिए प्रभावित कर सकता है।
नागरिकों ने मांग उठाई है कि मध्य प्रदेश के शहरी इलाकों में किसी भी पौधारोपण परियोजना को शुरू करने से पहले विशेषज्ञों द्वारा भू-मूल्यांकन अनिवार्य किया जाए। स्थानीय प्रशासन को स्पष्ट गाइडलाइन जारी करनी चाहिए ताकि केवल बाधक झाड़ियों को ही हटाया जाए और प्राकृतिक संपदा को कोई क्षति न पहुंचे। लोगों का मानना है कि केवल आंकड़े पूरे करने के लिए की जाने वाली ऐसी कार्रवाइयों से पर्यावरण को लाभ मिलने के बजाय भारी नुकसान पहुंचता है।
फिलहाल नगर निगम की इस दंडात्मक कार्रवाई के बाद पूरे प्रदेश में यह विषय चर्चा का केंद्र बना हुआ है। अब देखना यह होगा कि विभागीय जांच पूरी होने के बाद इसमें जिम्मेदार अधिकारियों पर क्या गाज गिरती है। वहीं, स्थानीय लोगों को उम्मीद है कि इस घटना से सबक लेते हुए भविष्य में पौधारोपण अभियानों के दौरान कड़ी निगरानी व्यवस्था सुनिश्चित की जाएगी।
