तकनीक के साथ संस्थागत सुधार भी जरूरी
डॉ. कामकोटि ने कहा कि टास्क फोर्स का उद्देश्य आधुनिक तकनीक के साथ संस्थागत सुधारों को जोड़कर परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। उनका मानना है कि बड़े स्तर पर आयोजित होने वाली प्रतियोगी परीक्षाओं में तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण है, लेकिन सिर्फ उसी पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा।
उन्होंने बताया कि जब उन्होंने वर्ष 1985 में जेईई परीक्षा दी थी, तब करीब 5 हजार अभ्यर्थी शामिल हुए थे, जबकि आज यह संख्या बढ़कर 15 लाख से अधिक हो गई है। ऐसे में विशाल परीक्षा तंत्र को सुरक्षित बनाए रखने के लिए नई व्यवस्थाओं की आवश्यकता है।
विशेषज्ञों की टीम तैयार करेगी सुधारों की रूपरेखा
टास्क फोर्स की अध्यक्षता तकनीकी विशेषज्ञ नंदन नीलेकणि कर रहे हैं। समिति में पूर्व इसरो प्रमुख डॉ. एस. सोमनाथ, पूर्व आईबी निदेशक तपन डेका, पूर्व शिक्षा सचिव अनीता करवाल, वरिष्ठ अधिकारी अमृत लाल मीणा सहित कई विशेषज्ञ शामिल हैं। यह टीम तकनीक, सुरक्षा, प्रशासन, लॉजिस्टिक्स और नीति निर्माण के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन कर सुधारों की सिफारिश करेगी।
‘मेकर-चेकर’ मॉडल पर भी मंथन
डॉ. कामकोटि ने बताया कि समिति बैंकिंग और वित्तीय संस्थानों की तरह ‘मेकर-चेकर’ मॉडल लागू करने की संभावना पर भी विचार कर रही है। इस व्यवस्था में किसी एक व्यक्ति द्वारा किए गए कार्य का स्वतंत्र रूप से दूसरे अधिकारी द्वारा सत्यापन किया जाएगा, जिससे परीक्षा प्रक्रिया की पारदर्शिता और सुरक्षा बढ़ाई जा सके। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि समिति अभी शुरुआती चरण में काम कर रही है और अंतिम सिफारिशों पर फिलहाल कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
पेपर लीक की सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
डॉ. कामकोटि के मुताबिक, किसी भी परीक्षा प्रणाली की सबसे अहम कड़ी प्रश्नपत्र तैयार करने वाला व्यक्ति होता है। उन्होंने कहा कि यदि प्रश्नपत्र तैयार करने की प्रक्रिया ही सुरक्षित और विश्वसनीय नहीं होगी, तो कोई भी तकनीक पेपर लीक को पूरी तरह नहीं रोक सकती। इसलिए प्रश्नपत्र तैयार करने वालों की जवाबदेही, ईमानदारी और पूरी प्रक्रिया की सुरक्षा सुनिश्चित करना टास्क फोर्स की प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल होगा।
