और इस कार्रवाई को लेकर विभिन्न स्तरों पर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले कई दिनों से जिले में अवैध खनन के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चलाया जा रहा था जिसमें नदी घाटों से लेकर खनन के संभावित और संदिग्ध क्षेत्रों तक लगातार छापेमारी की जा रही थी।
इस दौरान बिना वैध परमिट चल रहे वाहनों और ओवरलोड ट्रकों पर भी सख्त कार्रवाई की गई थी जिससे अवैध खनन से जुड़े नेटवर्क में हड़कंप की स्थिति बन गई थी। खासकर बिहार सीमा से आने वाले ट्रकों पर निगरानी बढ़ाए जाने के बाद इस अवैध कारोबार पर प्रशासन का दबाव काफी बढ़ गया था और कई स्थानों पर जुर्माना जब्ती और कानूनी कार्रवाई भी की गई थी।
इन कार्रवाइयों के चलते यह संकेत मिल रहा था कि प्रशासन इस बार अवैध खनन के खिलाफ पूरी सख्ती के मूड में है। लेकिन इसी बीच अचानक अधिकारी अभिषेक सिंह के निलंबन की कार्रवाई ने पूरे अभियान की दिशा और उसकी मंशा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा जोर पकड़ रही है कि जब अवैध खनन पर कार्रवाई का असर साफ तौर पर दिखाई देने लगा था
और माफिया नेटवर्क पर दबाव बढ़ रहा था तो ऐसे समय में कार्रवाई करने वाले अधिकारी को ही क्यों हटाया गया। जनपद में यह भी माना जा रहा है कि अवैध खनन का यह पूरा कारोबार केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं है बल्कि इसके पीछे एक मजबूत आर्थिक तंत्र और प्रभावशाली संरक्षण का नेटवर्क सक्रिय रहता है जो लंबे समय से इस अवैध गतिविधि को संचालित और सुरक्षित करता आया है।
ऐसे में जब किसी अधिकारी की सख्ती से करोड़ों के इस अवैध कारोबार पर सीधा असर पड़ता है तो कई बड़े हित प्रभावित होना स्वाभाविक माना जाता है। फिलहाल स्थिति यह है कि जहां एक ओर अवैध खनन से जुड़े तत्वों में राहत की भावना देखी जा रही है वहीं दूसरी ओर अभियान का नेतृत्व करने वाला अधिकारी खुद प्रशासनिक कार्रवाई के घेरे में आ गया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस प्रशासन और खनन विभाग की कार्यशैली पर भी गंभीर बहस छेड़ दी है और यह सवाल उठने लगा है कि क्या अवैध कारोबार पर सख्ती दिखाने की कोई कीमत भी चुकानी पड़ती है।
अब पूरे मामले में शासन स्तर पर अगली कार्रवाई पर सबकी नजरें टिकी हैं क्योंकि यह मामला केवल एक अधिकारी के निलंबन का नहीं बल्कि अवैध खनन के खिलाफ चल रही पूरी मुहिम की विश्वसनीयता और उसके भविष्य से जुड़ा हुआ माना जा रहा है।
