जानकारी के अनुसार नगर पालिका ने कुछ समय पहले बस स्टैंड स्थित इन दुकानों को जर्जर और क्षतिग्रस्त बताते हुए व्यापारियों को दुकानें खाली करने के नोटिस जारी किए थे। नगर पालिका का तर्क था कि भवन की स्थिति को देखते हुए सुरक्षा की दृष्टि से कार्रवाई आवश्यक है। हालांकि दुकानदारों ने इस निर्णय का विरोध करते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था।
व्यापारियों का कहना है कि शुक्रवार को ही Madhya Pradesh High Court की एकल पीठ ने मामले में सशर्त स्थगन आदेश जारी किया था। उनका दावा है कि आदेश मिलने के बाद भी नगर पालिका ने देर रात कार्रवाई करते हुए दुकानों को सील कर दिया। व्यापारियों का आरोप है कि यह कदम न्यायालय के निर्देशों और उसकी भावना के विपरीत है।
कार्रवाई के बाद प्रभावित दुकानदारों में नाराजगी देखी गई। उनका कहना है कि कई परिवार दशकों से इन दुकानों के माध्यम से अपनी आजीविका चला रहे हैं और अचानक की गई कार्रवाई से उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।
मामले में नगर पालिका के अधिकारियों से संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं मिल सकी। मुख्य नगर पालिका अधिकारी मिलन पटेल और संबंधित अधिकारियों से बातचीत नहीं हो पाई। वहीं नगर पालिका के सब इंजीनियर धीरेन्द्र रावत ने बताया कि सीएमओ बैठक के सिलसिले में बाहर हैं और उन्हें इस कार्रवाई की विस्तृत जानकारी नहीं है।
दूसरी ओर नगर पालिका अध्यक्ष प्रतिनिधि शैलेश बिट्टू सिंगार ने कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि दुकानों को खाली कराने के लिए पिछले तीन वर्षों से नोटिस जारी किए जा रहे थे। उनके अनुसार हाल ही में प्राप्त प्रशासनिक निर्देशों के बाद दुकानों को सीज करने की कार्रवाई की गई है।
व्यापारियों की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता Harshvardhan Singh Rathore ने दावा किया कि कार्रवाई में निर्धारित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। उनका कहना है कि मध्य प्रदेश नगरपालिका अधिनियम, 1961 की धारा 221 के तहत आवश्यक प्रक्रिया पूरी किए बिना दुकानों को सील किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित व्यापारी लगभग 30 वर्षों से इन दुकानों में व्यवसाय कर रहे हैं और भवन अभी भी उपयोग योग्य स्थिति में हैं।
सुनवाई के दौरान न्यायालय ने भी भवन की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल उठाए। न्यायालय ने टिप्पणी की कि नगर पालिका ऐसा कोई ठोस दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिससे यह सिद्ध हो सके कि भवन मरम्मत योग्य नहीं हैं। न्यायालय ने निर्देश दिया कि मुख्य नगर पालिका अधिकारी पहले यह निर्धारित करें कि भवन की मरम्मत संभव है या नहीं। इस प्रक्रिया के पूर्ण होने तक आगे की कार्रवाई पर रोक रहेगी।
फिलहाल यह मामला प्रशासनिक और कानूनी दोनों स्तरों पर चर्चा का विषय बना हुआ है। अब सभी की निगाहें न्यायालय के अगले निर्देशों और नगर पालिका के आधिकारिक पक्ष पर टिकी हुई हैं।
