वर्तमान में उपयोग होने वाला प्रथम पीढ़ी का इथेनॉल मुख्य रूप से गन्ना, मक्का और अन्य खाद्य फसलों से तैयार किया जाता है। दूसरी पीढ़ी के इथेनॉल में कृषि अवशेषों जैसे पराली, भूसा और अन्य जैविक कचरे का उपयोग होता है। हालांकि इन दोनों तकनीकों के सामने उत्पादन लागत, संसाधनों की उपलब्धता और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियां बनी रहती हैं। ऐसे में 3G इथेनॉल को अधिक टिकाऊ और भविष्य उन्मुख समाधान के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार 3G इथेनॉल उत्पादन का सबसे बड़ा आधार शैवाल है। शैवाल तेजी से बढ़ने वाला जैविक स्रोत है, जिसे उपजाऊ कृषि भूमि की आवश्यकता नहीं होती। यह खारे पानी, तालाबों, समुद्री तटीय क्षेत्रों और बंजर जमीनों पर भी विकसित किया जा सकता है। इससे कृषि भूमि पर दबाव कम पड़ता है और खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित नहीं होता।
3G इथेनॉल निर्माण की प्रक्रिया कई चरणों में पूरी होती है। सबसे पहले विशेष प्रकार के शैवालों की नियंत्रित परिस्थितियों में खेती की जाती है। इसके बाद उन्हें पानी से अलग कर सुखाया जाता है और उनका जैविक द्रव्यमान एकत्र किया जाता है। अगली प्रक्रिया में शैवाल की कोशिकाओं को तोड़कर उनमें मौजूद स्टार्च और कार्बोहाइड्रेट निकाले जाते हैं। इन तत्वों का जैविक फर्मेंटेशन कर अल्कोहल तैयार किया जाता है। अंत में शुद्धिकरण और डिस्टिलेशन की प्रक्रिया के बाद उच्च गुणवत्ता वाला इथेनॉल प्राप्त होता है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक केवल वैकल्पिक ईंधन तक सीमित नहीं है। 3G इथेनॉल का उपयोग पेट्रोल के साथ मिश्रण के रूप में किया जा सकता है, जिससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम होगी। इसके अलावा इसे उन्नत जैव ईंधन में परिवर्तित कर विमानन क्षेत्र में भी इस्तेमाल किया जा सकता है। यह क्षेत्र वर्तमान में कार्बन उत्सर्जन के बड़े स्रोतों में शामिल है, इसलिए हरित ईंधन की मांग लगातार बढ़ रही है।
औद्योगिक क्षेत्र में भी 3G इथेनॉल की उपयोगिता व्यापक मानी जा रही है। इससे बायोप्लास्टिक, विशेष रसायन और कई पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। साथ ही बिजली उत्पादन में भी इसका उपयोग संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। इससे ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण होगा और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा मिलेगा।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह तकनीक महत्वपूर्ण मानी जाती है। शैवाल अपने विकास के दौरान वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करते हैं, जिससे ग्रीनहाउस गैसों के प्रभाव को कम करने में मदद मिल सकती है। यही कारण है कि 3G इथेनॉल को कम कार्बन उत्सर्जन वाले ईंधन के रूप में देखा जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक को बड़े स्तर पर व्यावसायिक रूप से विकसित किया जाता है तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा, पर्यावरण संरक्षण और कचरा प्रबंधन की चुनौतियों का एक साथ समाधान देने में सक्षम हो सकती है। आने वाले वर्षों में 3G इथेनॉल स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र की सबसे महत्वपूर्ण तकनीकों में से एक बन सकता है।
