प्रस्तावित नीति में सबसे बड़ा बदलाव स्वैच्छिक और प्रशासनिक तबादलों को अलग-अलग श्रेणी में रखने का है। अब तक दोनों प्रकार के तबादले एक ही कोटे के अंतर्गत आते थे, जिसके कारण प्रशासनिक जरूरतों के अनुसार फेरबदल में बाधा आती थी। नई व्यवस्था में प्रशासनिक तबादलों के लिए अधिक स्वतंत्रता मिलने की संभावना है।
सूत्रों के अनुसार, कैबिनेट में इस बात पर भी चर्चा होगी कि तबादलों की सीमा तय की जाए या नहीं। पहले कुल कार्यरत कर्मचारियों के 10 से 15 प्रतिशत तक ही तबादलों की अनुमति दी जाती थी, लेकिन नई नीति में इस सीमा को लेकर लचीलापन अपनाया जा सकता है।
11 मई की पिछली कैबिनेट बैठक में मंत्री विजय शाह ने स्वैच्छिक तबादलों पर किसी तरह की सीमा न रखने का सुझाव दिया था, जिस पर मुख्यमंत्री ने विचार का आश्वासन दिया था। अब इसी सुझाव के आधार पर नीति में संशोधन की संभावना है।
नई तबादला नीति में यह भी प्रस्ताव है कि सभी विभाग ऑनलाइन प्रक्रिया के माध्यम से ट्रांसफर आवेदन स्वीकार करेंगे। इसके साथ ही स्कूल शिक्षा विभाग की नीति हर साल की तरह अलग रहेगी, जबकि राजस्व, ऊर्जा और जनजातीय कार्य जैसे विभाग अपनी अलग नीति जारी कर सकते हैं, लेकिन वे सामान्य प्रशासन विभाग के मूल नियमों से बाहर नहीं जा सकेंगे।
प्रशासनिक सूत्रों का कहना है कि नई व्यवस्था में जिलों के भीतर तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के तबादलों का अधिकार प्रभारी मंत्री और कलेक्टर को दिया जा सकता है। वहीं, उच्च स्तर के अधिकारियों के ट्रांसफर के लिए मुख्यमंत्री की मंजूरी अनिवार्य रहेगी।
यह भी प्रस्तावित है कि किसी कर्मचारी का एक बार तबादला होने के बाद उसे कम से कम एक वर्ष तक दोबारा ट्रांसफर नहीं किया जाएगा, जिससे स्थिरता बनी रहे।
कैबिनेट बैठक में तबादला नीति के अलावा राज्यमंत्री स्वेच्छानुदान बढ़ाने के फैसले पर भी औपचारिक आदेश जारी होने की संभावना है। इसे 16 हजार रुपये से बढ़ाकर 25 हजार रुपये कर दिया गया है।
कुल मिलाकर, बुधवार की कैबिनेट बैठक मध्य प्रदेश की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए बेहद अहम मानी जा रही है। तबादला नीति में बदलाव से न केवल कर्मचारियों की कार्यप्रणाली प्रभावित होगी, बल्कि प्रशासनिक संतुलन पर भी इसका व्यापक असर देखने को मिलेगा।
