भारतीय संस्कृति में प्रकृति को चेतना माना गया है। नदियाँ यहां मां हैं, वृक्ष देवता हैं और जल जीवन का आधार। आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में जब पर्यावरण संकट वैश्विक चिंता बनता जा रहा है, तब कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी हुए जिन्होंने भारतीय जीवनदृष्टि को आधुनिक पर्यावरणीय चिंताओं से जोड़ने का प्रयास किया। श्रद्धेय अनिल माधव दवे उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक थे। उनके लिए पर्यावरण साधना, सेवा और संस्कार का हिस्सा रहा। नर्मदा के तटों से लेकर संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ताओं तक, उन्होंने भारतीय चिंतन को मजबूती से रखा।
नर्मदा से जुड़ा आत्मिक रिश्ता
अनिल माधव दवे का नाम लेते ही सबसे पहले नर्मदा का स्मरण होता है। मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी उनके हृदय के अत्यंत निकट थी। उन्होंने नर्मदा को केवल नदी नहीं, बल्कि संस्कृति और सभ्यता की धारा माना।उनके गैर-सरकारी संगठन ‘नर्मदा समग्र’ के माध्यम से उन्होंने नदी संरक्षण के लिए व्यापक अभियान चलाए। नर्मदा किनारे वृक्षारोपण, घाटों की स्वच्छता, जैविक खेती को बढ़ावा और जल संरक्षण जैसे अनेक कार्य उनके नेतृत्व में हुए। उन्होंने दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए नदी एम्बुलेंस तक शुरू करवाई।
नर्मदा के प्रति उनका समर्पण इतना गहरा था कि उन्होंने सेना विमान से नर्मदा की हवाई परिक्रमा की और फिर पूरी नदी में राफ्टिंग कर उसके भूगोल, समाज और पर्यावरण को करीब से समझा। यह केवल रोमांच नहीं, बल्कि नदी को आत्मा से समझने का प्रयास था।
विचार महाकुंभ: परंपरा और आधुनिकता का संगम
साल 2016 में उज्जैन सिंहस्थ के दौरान आयोजित ‘अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ’ अनिल माधव दवे की दूरदृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण था। ‘जीवन जीने का सही तरीका’ विषय पर आयोजित इस महाआयोजन में संत, विचारक, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता एक मंच पर आए।इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता थी भारतीय परंपरा को आधुनिक विमर्श से जोड़ना। दवे मानते थे कि समाज के बड़े प्रश्नों का समाधान राजनीतिक बहसों में नहीं, बल्कि सामूहिक बौद्धिक मंथन से निकलता है। इसी चिंतन से ‘सिंहस्थ की सार्वभौमिक घोषणा’ तैयार हुई, जिसमें पर्यावरण, मानवता और सतत विकास को लेकर 51 सूत्र प्रस्तुत किए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इस आयोजन की सफलता का श्रेय अनिल माधव दवे जी को दिया था।
भोजन की बर्बादी को भी मानते थे पर्यावरण संकट
अनिल माधव दवे की सोच बड़े मंचों तक सीमित नहीं थी। वे जीवन के छोटे-छोटे व्यवहारों में भी पर्यावरणीय चेतना देखते थे। विचार महाकुंभ के दौरान जब उन्होंने लगभग 200 किलो भोजन बर्बाद होते देखा, तो वे बेहद व्यथित हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर लोगों से कहा, “थाली में उतना ही लें जितना खा सकें। इस अनाज को पैदा करने में प्रकृति का कितना योगदान है, यह समझना होगा।” निश्चित ही उनका यह कथन भारतीय जीवनशैली के उस मूल भाव को सामने लाता था जिसमें अन्न, जल और प्रकृति के प्रति सम्मान सर्वोपरि माना गया है।
आरएसएस प्रचारक से पर्यावरण मंत्री तक कीयात्रा
अनिल माधव दवे का सार्वजनिक जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में शुरू हुआ। संगठनात्मक क्षमता, सरलता और रणनीतिक सोच के कारण उन्होंने राजनीति में भी अपनी विशेष पहचान बनाई। साल 2003 में मध्य प्रदेश की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की रणनीति तैयार करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। बाद में वे राज्यसभा सांसद बने और संसदीय समितियों में सक्रिय भूमिका निभाई। जुलाई 2016 में उन्हें केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री नियुक्त किया गया।
मंत्री बनने के बाद उनके सामने कई जटिल चुनौतियां थीं, जलवायु परिवर्तन, विकास परियोजनाओं की मंजूरी, वायु प्रदूषण, जैविक विविधता और आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों जैसे विषय। लेकिन उन्होंने हमेशा भारतीय दृष्टिकोण और संतुलन को प्राथमिकता दी।
विचारों में मतभेद, संवाद में नहीं
अनिल माधव दवे की सबसे बड़ी विशेषता थी संवाद की क्षमता। वे वैचारिक मतभेदों को कभी दूरी का कारण नहीं बनने देते थे। गांधीवादी पर्यावरणविद् अनुपम मिश्रा से उनके आत्मीय संबंध इसका उदाहरण हैं। दवे, संघ पृष्ठभूमि से होने के बावजूद, मिश्रा जैसे विचारकों से लगातार सीखते रहे। बीमारी के दौरान वे अस्पताल में घंटों उनके पास बैठे रहते थे। यह उनकी विनम्रता और सीखने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।
भारतीय दृष्टि से जलवायु परिवर्तन की वकालत
संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन वार्ताओं में अनिल माधव दवे ने भारत की स्थिति को मजबूती से रखा। वे मानते थे कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल विकासशील देशों पर नहीं डाली जा सकती।उनका स्पष्ट मत था कि प्रकृति के साथ संतुलन भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है, इसलिए भारत को पर्यावरण के प्रश्न पर पश्चिमी देशों से सीखने की नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।
सादगी में छिपा असाधारण व्यक्तित्व
राजनीति के उच्च पदों पर पहुंचने के बावजूद दवे का जीवन अत्यंत सादा रहा। वे दिखावे और व्यक्तिपूजा से दूर रहते थे। उनकी वसीयत इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि उनके नाम पर कोई स्मारक या पुरस्कार न बनाया जाए। यदि कोई उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहता है, तो वह वृक्ष लगाए, जल स्रोतों का संरक्षण करे और नदियों को बचाने का प्रयास करे। वस्तुतः यह विचार बताता है कि उनके लिए जीवन का उद्देश्य प्रसिद्धि नहीं, बल्कि प्रकृति और समाज की सेवा था।
एक अधूरा लेकिन प्रेरणादायक सफर
18 मई 2017 को हृदयाघात से उनका निधन हो गया। मात्र 61 वर्ष की आयु में उनका जाना देश के लिए बड़ी क्षति थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “व्यक्तिगत क्षति” बताया था। किंतु अनिल माधव दवे उन दुर्लभ लोगों में थे जिन्होंने राजनीति, अध्यात्म और पर्यावरण को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। उन्होंने दिखाया कि विकास और प्रकृति विरोधी नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टि से दोनों साथ चल सकते हैं।
आज जब नदियाँ प्रदूषित हैं, जंगल सिमट रहे हैं और जल संकट गहरा रहा है, तब अनिल माधव दवे की सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक लगती है। उनका जीवन हमें यह बार-बार याद दिलाता है कि पर्यावरण की रक्षा कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं, यह तो जीवन जीने की संस्कृति है। शत् शत् नमन ।
