प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि प्लांट के संचालन के लिए आवश्यक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और फायर सेफ्टी एनओसी तक मौजूद नहीं थी। इसके बावजूद प्लांट लंबे समय से संचालित हो रहा था, जिससे सुरक्षा मानकों की अनदेखी का बड़ा मामला उजागर हुआ है।
घटना उस समय हुई जब गेहूं की नरवाई (फसल अवशेष) के बड़े-बड़े बंडल खुले मैदान में रखे थे। अचानक लगी आग ने कुछ ही देर में विकराल रूप धारण कर लिया और पूरे क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई। राहत की बात यह रही कि आग पास स्थित इंडियन ऑयल के पेट्रोल पंप और बीपीसीएल के गैस गोदाम तक नहीं पहुंची, वरना स्थिति और भी भयावह हो सकती थी।
प्रशासन की तत्परता के बावजूद घटना के 24 घंटे बाद तक नरवाई के ढेरों में धुआं और सुलगन जारी रही। दमकल दल लगातार कूलिंग में जुटे रहे, जबकि अधिकारी मौके पर निरीक्षण करते रहे।
जानकारी के अनुसार, प्लांट का संचालन ग्राम पंचायत से सामान्य एनओसी लेकर शुरू किया गया था, जबकि बड़े औद्योगिक संचालन के लिए जरूरी अनुमति प्रक्रियाओं की अनदेखी की गई। स्थानीय लोगों का यह भी कहना है कि पहले भी यहां आग लगने की छोटी घटनाएं हो चुकी थीं, लेकिन सुरक्षा उपायों में सुधार नहीं किया गया।
करीब 2 करोड़ 20 लाख रुपये की लागत से बने इस प्लांट के लिए बैंक से ऋण भी लिया गया था और शासन से सब्सिडी मिलने की बात भी सामने आई है। ऐसे में बिना मानक सुरक्षा व्यवस्था के इतने संवेदनशील प्लांट का संचालन अब कई सवाल खड़े कर रहा है।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि इतने बड़े औद्योगिक यूनिट के पास स्थित पेट्रोल पंप और गैस गोदाम जैसे हाई-रिस्क क्षेत्र में भी किसी भी स्तर पर आपत्ति दर्ज नहीं की गई।
फिलहाल प्रशासनिक जांच जारी है, लेकिन दो दिन बाद भी यह स्पष्ट नहीं हो पाया है कि आखिर आग कैसे लगी और इसके लिए वास्तविक जिम्मेदार कौन है।
