राज्य में वर्ष 2003 के बाद बिजली संकट से उबरने के लिए बड़ी संख्या में बिजली उत्पादन कंपनियों के साथ समझौते किए गए थे। इन समझौतों के कारण जहां बिजली आपूर्ति व्यवस्था मजबूत हुई, वहीं कई मामलों में इन अनुबंधों को लेकर विवाद और वित्तीय बोझ की स्थिति भी बनी।
वर्तमान में प्रदेश में लगभग 1795 बिजली खरीद समझौते (PPA) पहले से मौजूद हैं, जिनकी कुल क्षमता करीब 26,012 मेगावाट बताई जाती है। इन समझौतों के कारण मध्य प्रदेश को अब ऊर्जा सरप्लस राज्य के रूप में देखा जा रहा है।
सरकार का मानना है कि दीर्घकालिक बिजली समझौते बड़े वित्तीय दायित्व होते हैं, जो लंबे समय तक राज्य की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं। इसलिए अब यह जरूरी समझा गया है कि ऐसे सभी नए समझौतों पर शीर्ष स्तर यानी कैबिनेट की मंजूरी ली जाए।
इसके पीछे एक कारण यह भी है कि ऊर्जा क्षेत्र में सौर, पवन, बायोमास, न्यूक्लियर और बैटरी स्टोरेज जैसी नई तकनीकें तेजी से उभर रही हैं, जिनसे जुड़े अनुबंधों में विशेषज्ञ और वित्तीय मूल्यांकन की आवश्यकता बढ़ गई है।
अब तक यह निर्णय पॉवर मैनेजमेंट कंपनी के बोर्ड स्तर पर लिया जाता था, लेकिन नई व्यवस्था के तहत पहले ऊर्जा मंत्री की मंजूरी और फिर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली कैबिनेट से अंतिम स्वीकृति जरूरी होगी।
सरकार का दावा है कि यह कदम भविष्य में ऊर्जा खरीद को अधिक संतुलित, पारदर्शी और राज्य हित में बनाएगा।
