ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन ने बताया कि डे ब्रेक का मकसद कंपनियों को एडवांस साइबर खतरों से बचाने में मदद करना है। यह प्लेटफॉर्म सिक्योर कोड रिव्यू, थ्रेट मॉडलिंग, पैच वैलिडेशन और सॉफ्टवेयर में मौजूद कमजोरियों की पहचान जैसे काम कर सकता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक इसमें GPT-5.5, GPT-5.5-Cyber और Codex Security जैसे सिस्टम का इस्तेमाल किया जा रहा है।
डे ब्रेक को सीधे तौर पर Anthropic के “Project Glasswing” और “Claude Mythos” के जवाब के रूप में देखा जा रहा है। Claude Mythos को लेकर पिछले कुछ महीनों से काफी चर्चा रही है, क्योंकि कंपनी ने दावा किया था कि यह मॉडल साइबर सिक्योरिटी से जुड़े बेहद जटिल काम कर सकता है और कई पुराने सॉफ्टवेयर बग्स व कमजोरियों को पहचान चुका है। सुरक्षा चिंताओं के कारण इसे आम लोगों के लिए जारी नहीं किया गया और फिलहाल चुनिंदा पार्टनर्स के साथ टेस्ट किया जा रहा है।
हालांकि सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्ट्स में Mythos को “किसी भी सिस्टम को हैक करने वाला AI” बताकर पेश किया जा रहा है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इन दावों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है। अब तक सार्वजनिक रूप से ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं आया है कि यह मॉडल बिना अनुमति किसी भी सिस्टम को हैक कर सकता है।
दूसरी ओर OpenAI ने Daybreak को ज्यादा सहयोगी और नियंत्रित तरीके से पेश किया है। कंपनी का कहना है कि वह अधिक से अधिक कंपनियों और सुरक्षा विशेषज्ञों के साथ मिलकर इसे टेस्ट करना चाहती है ताकि साइबर हमलों से बचाव को मजबूत किया जा सके। Oracle, Cisco और Cloudflare जैसी कंपनियों के साथ साझेदारी की भी चर्चा है।
टेक विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले समय में AI कंपनियों के बीच सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा “सुरक्षित AI” और “साइबर डिफेंस” को लेकर होने वाली है। यही वजह है कि अब AI मॉडल सिर्फ चैटिंग या कंटेंट बनाने तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि डिजिटल सुरक्षा और राष्ट्रीय साइबर ढांचे का भी अहम हिस्सा बन सकते हैं।
