सांसद अख्तर हुसैन ने सदन की कार्यवाही के दौरान यह तर्क दिया कि बंगाल में भाजपा की सरकार बनने की सूरत में बड़ी संख्या में लोगों को सीमा के उस पार धकेला जा सकता है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि एग्जिट पोल के परिणाम यदि हकीकत में बदलते हैं, तो बांग्लादेश को प्रवासियों के एक बड़े सैलाब का सामना करना पड़ सकता है, जिसके लिए उनका देश फिलहाल तैयार नहीं है। उनके अनुसार, यह स्थिति न केवल पड़ोसी संबंधों के लिहाज से चुनौतीपूर्ण होगी, बल्कि बांग्लादेश की आंतरिक व्यवस्था के लिए भी एक शरणार्थी संकट पैदा कर देगी। उन्होंने इस स्थिति को लेकर अपने देश के भीतर एकजुटता की अपील की और इसे एक संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दा करार दिया।
इस बयान के सार्वजनिक होने के बाद भारतीय राजनीति में भी तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। भारतीय जनता पार्टी के प्रतिनिधियों ने इस अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया को आधार बनाते हुए स्थानीय विपक्षी दलों पर निशाना साधा है। भाजपा का रुख है कि विदेशी संसद में इस तरह की चिंता का प्रकट होना इस बात का प्रमाण है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में घुसपैठ की समस्या कितनी गहरी है। नेताओं का कहना है कि उनकी पार्टी का संकल्प घुसपैठ को पूरी तरह समाप्त करना और सीमाओं को सुरक्षित करना है। भारतीय राजनेताओं ने इसे राष्ट्रवाद की जीत बताते हुए कहा कि पड़ोसी देश की यह घबराहट दिखाती है कि अब तुष्टीकरण की राजनीति के दिन खत्म होने वाले हैं।
गौरतलब है कि बंगाल के इस चुनाव में अवैध घुसपैठ और नागरिकता से जुड़े मुद्दे सबसे प्रमुख रहे हैं। जहाँ एक तरफ भाजपा ने घुसपैठियों को चिन्हित कर बाहर निकालने की गारंटी दी है, वहीं अन्य दल इसे अलग नजरिए से देखते रहे हैं। एग्जिट पोल के विरोधाभासी आंकड़ों के बीच, जहाँ कुछ सर्वे भाजपा की ऐतिहासिक जीत का दावा कर रहे हैं और कुछ वर्तमान सत्ता की वापसी का, बांग्लादेशी सांसद का यह बयान अब बहस का मुख्य केंद्र बन गया है। 4 मई के आधिकारिक नतीजे न केवल पश्चिम बंगाल का भविष्य तय करेंगे, बल्कि यह भी स्पष्ट करेंगे कि आने वाले समय में सीमाई राजनीति और भारत-बांग्लादेश के संबंध किस दिशा में मुड़ेंगे।
