नई व्यवस्था के तहत एक शैक्षणिक सत्र जुलाई में शुरू होगा, जबकि दूसरा सत्र जनवरी से प्रारंभ किया जाएगा। जुलाई सत्र में सभी सीटों पर एडमिशन के लिए सेंट्रलाइज्ड काउंसलिंग कराई जाएगी। इसके बाद जो सीटें खाली रह जाएंगी, उन्हें जनवरी सत्र में भरा जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे सीटें खाली रहने की समस्या खत्म होगी और एडमिशन प्रक्रिया समयबद्ध तरीके से पूरी हो सकेगी।
फिलहाल स्थिति यह है कि एडमिशन प्रक्रिया सितंबर-अक्टूबर तक खिंच जाती है और कई बार सीटों को लेकर विवाद कोर्ट तक पहुंच जाते हैं। नई व्यवस्था से इस देरी पर रोक लगेगी और एकेडमिक कैलेंडर भी तय समय पर लागू किया जा सकेगा।
हालांकि, इस बदलाव को लेकर शिक्षा विशेषज्ञों ने कुछ चिंताएं भी जताई हैं। प्रस्ताव के मुताबिक, जनवरी सत्र में प्रवेश लेने वाले छात्रों को सीधे दूसरे सेमेस्टर से पढ़ाई शुरू कराई जा सकती है। बाद में वे पहले सेमेस्टर की पढ़ाई करेंगे। इसी तरह आगे भी सेमेस्टर का क्रम उलट-पुलट तरीके से चल सकता है जैसे चौथा सेमेस्टर पहले और तीसरा बाद में।
विशेषज्ञों का कहना है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई में विषय आपस में जुड़े होते हैं। ऐसे में बेसिक विषयों से पहले एडवांस विषय पढ़ना छात्रों की समझ को प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा प्लेसमेंट पर भी असर पड़ने की आशंका है। जनवरी सत्र में एडमिशन लेने वाले छात्र फरवरी-मार्च के आसपास पासआउट होंगे, जबकि अधिकांश कंपनियां दिसंबर तक पास होने वाले छात्रों को ही भर्ती करती हैं। ऐसे में उनके लिए अलग प्लेसमेंट ड्राइव आयोजित करनी पड़ सकती है।
लेटरल एंट्री के छात्रों पर भी इसका असर पड़ सकता है। अभी डिप्लोमा के बाद दूसरे वर्ष में प्रवेश के लिए जो सीटें बचती हैं, वे अगले सत्र में भरी जाती हैं। लेकिन साल में दो बार एडमिशन होने से इन सीटों की उपलब्धता कम हो सकती है।
सरकार का तर्क है कि इस व्यवस्था से विश्वविद्यालय पर अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ेगा और दो अलग-अलग ग्रुप बनाकर पढ़ाई सुचारु रूप से चलाई जा सकेगी। कंपनियां भी अपने प्लेसमेंट शेड्यूल में बदलाव कर सकती हैं।
कुल मिलाकर, यह नई व्यवस्था जहां एक ओर एडमिशन प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित और लचीला बनाएगी, वहीं छात्रों और संस्थानों के सामने नई चुनौतियां भी खड़ी कर सकती है। आने वाले समय में इसका वास्तविक असर साफ तौर पर देखने को मिलेगा।
