इस आंदोलन में सबसे आगे मणिपुर की महिलाएं दिखाई दे रही हैं, जो हजारों की संख्या में सड़कों पर उतरकर विरोध दर्ज करा रही हैं। ये महिलाएं दिन के समय रास्तों को रोककर धरना दे रही हैं और आवाजाही को नियंत्रित कर रही हैं। कई इलाकों में स्थिति ऐसी है कि वहां न तो आम नागरिकों को आने-जाने की अनुमति है और न ही सुरक्षा बलों की सामान्य आवाजाही हो पा रही है। रात के समय ये महिलाएं मशाल रैलियों के जरिए इलाकों में गश्त कर रही हैं, जिससे आंदोलन और अधिक संगठित और प्रभावी दिखाई दे रहा है।
प्रदर्शन में शामिल महिलाओं का कहना है कि वे घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। उनके अनुसार यह केवल भावनात्मक नहीं बल्कि नैतिक जिम्मेदारी का हिस्सा है, जिसे वे संतुलित तरीके से निभा रही हैं। इस आंदोलन के चलते स्थानीय बाजारों और आर्थिक गतिविधियों पर भी असर पड़ा है, जिससे कई परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है। इसके बावजूद कुछ महिलाएं अपने काम के साथ-साथ आंदोलन में भागीदारी भी जारी रखे हुए हैं।
इस आंदोलन का नेतृत्व करने वाली सामुदायिक संरचनाएं लंबे समय से शांति और सामाजिक संतुलन की मांग करती रही हैं। यह संगठन संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों में सामाजिक व्यवस्था बनाए रखने और मानवाधिकारों की रक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाता रहा है। इतिहास में भी इस तरह के आंदोलन सामाजिक मुद्दों और कानून-व्यवस्था से जुड़े सवालों को लेकर सामने आते रहे हैं, जिन्होंने व्यापक जनसमर्थन हासिल किया है।
यह पूरा विवाद एक रॉकेट हमले से शुरू हुआ था, जिसमें एक घर को निशाना बनाया गया था। इस हमले में एक छोटे बच्चे, एक बच्ची और उनकी मां की मौत हो गई थी। घटना के बाद पूरे क्षेत्र में गुस्सा फैल गया और धीरे-धीरे यह विरोध बड़े आंदोलन में बदल गया।
फिलहाल राज्य में तनावपूर्ण स्थिति बनी हुई है और लोग शांति बहाली की मांग कर रहे हैं। महिलाओं के इस व्यापक आंदोलन ने स्थिति को और अधिक गंभीर बना दिया है, जिससे प्रशासन और समाज दोनों के सामने शांति बहाली की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है।
