विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष: दिया जाता है बेकार को आकार

झाँसी: पर्यावरण का बदलता मिजाज न सिर्फ हमारे घरों में बल्कि देश दुनिया के लिए चिंता का विषय बना हुआ है। इसका निवारण करने हेतु कुछ जागरूक लोग व संगठन जुड़े हुए हैं। सामान्यतः लोग घर के बेकार सामान को कबाड़ी को बेच देते हैं या फिर वह रखा रखा बर्बाद हो जाता है। नगर के घरों से निकलकर गली मोहल्लों की सड़कों और नगर निगम की कचरा इकट्ठा करने वाली गाड़ी में पहुंचने वाला कचरा और कबाड़ घर, सजाने व पर्यावरण बचाने के भी काम आ सकता है। यह बात अभी सभी सरकारी महकमे तक नहीं पहुंच पाई है। लेकिन, शिवपुरी रोड किनारे स्थित बैंकर्स कॉलोनी निवासी नीलम सारंगी इस कचरे का उपयोग घर एवं नगर की सुंदरता सहित पर्यावरण स्वच्छता में करतीं हैं।
कबाड़ हो या कचरा नीलम की दृष्टि उसमें कला और हरियाली ढूंढ निकालती है। जो कचरा खंती में जाकर दुर्गंध पैदा करता है, वही कचरा नीलम सारंगी के हाथों में पहुंचकर कलात्मक वस्तु बन जाता है। नीलम सारंगी का घर पर्यावरण का आदर्श केंद्र है। इसके साथ ही तमाम स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, सरकारी, गैर सरकारी संस्थानों में जाकर बेकार की चीजों का उपयोग पर्यावरण के हित में करने का उपाय बताती हैं। उनके इस प्रयास की नगर में भरपूर सराहना की जाती है। उनकी इस कार्य की महत्वता को समझते हुए प्रिंट मीडिया के साथ-साथ लोकसभा चैनल ने भी इनकी प्रशंसा की है।
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राज्यपाल द्वारा पुरस्कृत नीलम के प्रयासों का सभी मानते हैं लोहा

केन्द्रीय कृषि विश्वविद्यालय, बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, राजकीय संग्रहालय, ललित कला अकादमी समर कैंप सहित तमाम विश्वविद्यालयों में आमंत्रित करके उनके प्रयास को प्रदर्शित करके उनके कार्य को महत्व प्रदान किया जाता है। विश्व पर्यावरण दिवस पर BHEL झाँसी महिला समाज द्वारा पर्यावरण पर आयोजित कार्यक्रम में उन्हें बेकार को आकार विषय पर व्याख्यान के लिए आमंत्रित भी किया जा चुका है। राज्यपाल  द्वारा पुरस्कृत नीलम सारंगी का पर्यावरण के लिए प्रयास निरंतर जारी है।

तेजाब से सब्जियों का धोना देखकर आया ऑर्गेनिक सब्जियां उगाने का विचार

नीलम बताती हैं कि उन्हें शुरु से ही गार्डनिंग का शौक था। जब वह भोपाल में थी तो उनके यहां गार्डन की देखभाल के लिए माली आता था। वह उसको काम करते हुए देखती और उससे बहुत सारे प्रश्न पूछती परंतु उनका माली सारे केमिकल दवाइयां इस्तेमाल करता था। उनके घर के सामने साप्ताहिक सब्जी मंडी लगती थी। वहां पर सब्जी वाले आलू, अदरक, लौकी व फूलगोभी जैसी सब्जियों को धोने के लिए तेजाब तथा अन्य केमिकल का उपयोग करते हैं। वहीं से उनके मन में ऑर्गेनिक सब्जियां उगाने का विचार आया। फिर वह पद्मश्री सुभाष पालेकर के जीरो बजट अभियान से जुड़ीं। वहां पर उन्हें बहुत सारी जानकारी प्राप्त हुई। जिसमें गाय के गोबर, गोमूत्र से कैसे नेचुरल फार्मिंग की जाती है उसे समझा।

किचिन गार्डन में हैं 800 से अधिक पौधे

जब वह जब झाँसी आयीं तो उनके पास कम जगह थी फिर भी उन्होंने किचन गार्डनिंग की शुरुआत की। गाय के गोबर और गोमूत्र के साथ-साथ कुछ अपने भी नए प्रयोग किए। काफी परेशानियां आई पर धीरे-धीरे उनके हल भी मिले। आज उनके पास 100 इनडोर प्लांट के साथ-साथ 700-800 पौधे छत पर हैं। उन्होंने अपने गार्डन में बायोडायवर्सिटी का पूरा ध्यान रखा है। जिसमें सब्जी, फल व फूल यहां तक कि उनके पास बहुत सारे मेडिसिन प्लांट भी हैं।

जनहित में समय प्रदान करने को सदैव तत्पर

काफी दूर-दूर से लोग गार्डन को देखने आते हैं। अगर किसी को कुछ परेशानी होती है, तो वह लोगों की मदद भी करतीं हैं। यहां तक कि फेसबुक और सोशल मीडिया के माध्यम से भी लोगों की मदद करती हैं। साथ ही ऑनलाइन और ऑफलाइन किचन गार्डन की ट्रेनिंग भी देती हैं। हाल ही में कोरोना काल में उन्होंने बच्चों व बुजुर्गों को भी एक दिन का निशुल्क प्रशिक्षण दिया है।

Alok Pachori (A.T.A)

Assistant Editor, Social Media Manager, Founder Of The Jhansi Writers

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