स्थानीय लोगों और मंदिर के पुजारी शिवम मिश्रा के अनुसार, मंदिर में शिवलिंग को ढकने के लिए कई बार छत या लेंटर डालने की कोशिश की गई, लेकिन हर बार कोई न कोई बाधा आ गई। कभी निर्माण सामग्री क्षतिग्रस्त हो गई, तो कभी जमीन धंसने की घटनाएं सामने आईं, जिसके चलते काम अधूरा रह गया।
प्राचीन मान्यताओं से जुड़ा इतिहास
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह स्थान महर्षि दुर्वासा की तपोभूमि रहा है। कहा जाता है कि द्वापर युग में महर्षि दुर्वासा ने यहां बरगद के पेड़ के नीचे वर्षों तक तपस्या की थी, जो पेड़ आज भी मंदिर परिसर में मौजूद है। मान्यता यह भी है कि महाभारत काल में माता कुंती और माता गांधारी यहां आकर आशीर्वाद प्राप्त करती थीं।
मुगलकाल से जुड़ी रहस्यमयी कथा
स्थानीय कथाओं के अनुसार, मुगल शासनकाल में यह शिवलिंग झाड़ियों में दब गया था। बाद में जब ग्रामीणों ने एक गाय को रोज उसी स्थान पर जाते देखा, तो जांच करने पर पाया गया कि गाय के दूध की धारा स्वयं शिवलिंग पर गिर रही थी। इसके बाद यह स्थान फिर से प्रकाश में आया।
कहा जाता है कि तत्कालीन मुगल शासक द्वारा शिवलिंग को नुकसान पहुंचाने या हटाने का प्रयास किया गया, लेकिन हर बार प्रयास असफल रहा। यहां तक कि आरे से काटने की कोशिश के निशान आज भी शिवलिंग पर होने का दावा किया जाता है।
आस्था का केंद्र और कांवड़ मेला
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, एक ग्रामीण को स्वप्न में आदेश मिलने के बाद यहां गंगाजल से जलाभिषेक की परंपरा शुरू हुई। तभी से सावन और फाल्गुन में यहां कांवड़ मेला लगता है, जिसमें देशभर से हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं और शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं।
आज यह मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि अपने रहस्यमयी इतिहास के कारण भी लोगों के आकर्षण का प्रमुख स्थल बना हुआ है।
