यमुना नदी पर गिरने वाले नालों पर सीवेज शोधन संयंत्र (STP)बनाये जाए
जल सहेलियों ने अपनी 500 किलोमीटर की यमुना यात्रा के अनुभव मीडिया से किए शेयर
उरई/जालौन। जल सहेली फाउंडेशन के संस्थापक डॉ संजय सिंह ने कह कि जालौन जिले के पचनदा से लेकर दिल्ली के वासुदेव घाट तक की जलसहेलियों की यमुना नदी को अविरल और निर्मल बनाने की 500 किलो मीटर की पदयात्रा के समापन के बाद वे और जल सहेलियों इस यात्रा के अपने अनुभव आज श्री हरि के सभागार में मीडिया सेशेयर कर रही थी।

उन्होंने बताया कि अविरल-निर्मल यमुना यात्रा का समापन: जल सहेलियों की 500 किलोमीटर पदयात्रा ने नदी संरक्षण की चेतना को किया मजबूत यमुना नदी को अविरल और निर्मल बनाने के संकल्प के साथ बुंदेलखंड की जल सहेलियों द्वारा संचालित लगभग 500 किलोमीटर लंबी “अविरल-निर्मल यमुना यात्रा” सफलतापूर्वक संपन्न हो चुकी है। यह यात्रा 29 जनवरी को जालौन जनपद स्थित पंचनदा धाम से प्रारंभ हुई थी, जहाँ यमुना, चंबल, सिंध, पहुज और क्वारी नदियों का संगम होता है। कई जिलों और सैकड़ों गाँवों से होते हुए यह यात्रा अंततः दिल्ली के वासुदेव घाट पर जाकर पूर्ण हुई।
इस यात्रा के दौरान बुंदेलखंड की जल सहेलियाँ गाँव-गाँव और शहर-शहर पहुँचीं। उन्होंने लोगों से संवाद करते हुए नदी की वर्तमान स्थिति से समाज को अवगत कराया और जल संरक्षण को जन आंदोलन का रूप देने का संदेश दिया। यह यात्रा केवल पदयात्रा नहीं थी, बल्कि नदी और समाज के बीच संबंधों को मजबूत करने का एक प्रयास भी रही।
इस पदयात्रा में लगभग 620 जल सहेलियों ने सक्रिय रूप से भाग लिया। यात्रा के दौरान जल सहेलियों ने 32 से अधिक विद्यालयों में जाकर लगभग 34,115 विद्यार्थियों से संवाद किया और उन्हें जल संरक्षण, नदी संरक्षण तथा पर्यावरण के महत्व के बारे में जागरूक किया। इसके साथ ही ग्रामवासियों, युवाओं, किसानों और अन्य नागरिकों सहित लगभग 61,000 से अधिक लोगों से सीधा संवाद किया गया।
यात्रा के दौरान कई स्थानों पर ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने जल सहेलियों का स्वागत किया तथा यमुना कलश पर पुष्प वर्षा कर उनका अभिनंदन किया। कई स्थानों पर लोगों ने उनके संकल्प और साहस की सराहना करते हुए उन्हें “जल पुत्री” कहा, वहीं कुछ स्थानों पर उनके साहस और नेतृत्व को वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई से प्रेरित बताया गया।
यात्रा के प्रारंभिक दिनों में जब तापमान लगभग 10 डिग्री सेल्सियस था, तब भी जल सहेलियों ने अपने संकल्प को कमजोर नहीं होने दिया और निरंतर अपने लक्ष्य की ओर आगे बढ़ती रहीं। बदलते मौसम में धूप, बारिश और विभिन्न कठिन परिस्थितियों का सामना करते हुए भी उन्होंने अपनी यात्रा जारी रखी और अंततः दिल्ली के वासुदेव घाट तक पहुँचकर इस ऐतिहासिक यात्रा का समापन किया।
यात्रा के दौरान यह भी स्पष्ट रूप से सामने आया कि कई स्थानों पर यमुना नदी का प्रवाह अत्यंत कम हो गया है। चंबल से मिलने से पहले नदी में पानी की मात्रा बहुत कम हो जाती है और कई स्थानों पर घरेलू सीवेज, औद्योगिक अपशिष्ट, प्लास्टिक कचरा तथा अतिक्रमण के कारण नदी गंभीर रूप से प्रदूषित हो रही है। इस दौरान लोगों को यह संदेश दिया गया कि यदि अभी से सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में इसके गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
यात्रा के दौरान जल सहेलियों ने गाँव-गाँव और शहर-शहर जाकर लोगों से संवाद किया और जल संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर “जल समितियों” के गठन का प्रयास किया, ताकि समाज स्वयं आगे आकर अपने जल स्रोतों और नदियों के संरक्षण के लिए कार्य कर सके। कई स्थानों पर “यमुना चौपाल” का आयोजन भी किया गया, जिसमें ग्रामीणों के साथ चर्चा कर यह समझाया गया कि जिन नदियों से हमारा जीवन चलता है, उन्हीं नदियों को हमने प्रदूषित कर दिया है।यात्रा के दौरान 15 से अधिक यमुना संवाद आयोजित किए गए, जिनमें नदी संरक्षण और जल प्रबंधन के विषय पर चर्चा की गई। लगभग 29 से अधिक स्कूलों और कॉलेजों में जल सहेलियों के ठहरने की व्यवस्था की गई, जिससे यह पदयात्रा सुचारु रूप से आगे बढ़ सकी।
समाज के विभिन्न वर्गों और संस्थाओं ने भी इस यात्रा को महत्वपूर्ण सहयोग दिया। ब्रज क्षेत्र के कण-कण में सूर्य की पुत्री, यम की बहन और भगवान श्रीकृष्ण की पटरानी माँ यमुना के प्रति लोगों की गहरी श्रद्धा देखने को मिलती है। इसी का परिणाम है कि यमुना छठ के अवसर पर मथुरा के विश्राम घाट पर लगभग 100 जल सहेलियों को आमंत्रित कर उनका सम्मान किया गया, और विभिन्न स्थानों पर भी उनका अभिनंदन किया जा रहा है।
यात्रा के अनुभवों और क्षेत्रीय परिस्थितियों के आधार पर जल सहेलियों ने यमुना नदी के संरक्षण और पुनर्जीवन के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव भी प्रस्तुत किए हैं। इटावा से आगरा के बीच के बीहड़ एवं असमतल क्षेत्रों में वर्षा जल संचयन की संभावनाओं को देखते हुए तालाब, चेक डैम, रिजर्वॉयर तथा अन्य रिचार्ज संरचनाओं का निर्माण कराया जाना चाहिए, जिससे वर्षा के अतिरिक्त जल का संचयन और भूजल पुनर्भरण हो सके।
यमुना के तटवर्ती पारंपरिक जल स्रोतों और तालाबों का पुनर्जीवन किया जाए तथा इसके लिए तकनीकी सर्वेक्षण कराया जाए। यमुना नदी में पर्याप्त पर्यावरणीय प्रवाह सुनिश्चित करने के लिए हथनी कुंड से जल प्रवाह के समुचित प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए और कम प्रवाह वाले क्षेत्रों में रबर डैम तथा अन्य लघु जल संरचनाओं का निर्माण किया जाए।
पिनाहट क्षेत्र में उसेत घाट लिफ्ट परियोजना की क्षमता बढ़ाकर चंबल के जल को यमुना में प्रवाहित करने की संभावनाओं पर विचार किया जाए तथा उद्गम नदी के जल की गुणवत्ता में सुधार कर उसे वर्षा के बाद यमुना में छोड़ा जाए।
इसके साथ ही यमुना में गिरने वाले प्रमुख नालों पर प्रभावी सीवेज शोधन संयंत्र (STP) स्थापित कर उनकी नियमित निगरानी सुनिश्चित की जाए तथा तटवर्ती क्षेत्रों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली विकसित कर कचरे के सीधे नदी में जाने को रोका जाए।
औद्योगिक और अवैध अपशिष्ट के प्रवाह को रोकने के लिए कठोर निगरानी और दंडात्मक कार्रवाई आवश्यक है। जल शोधन के लिए वनस्पति आधारित प्राकृतिक प्रणाली (Constructed Wetland) को भी बढ़ावा दिया जाए।
यमुना के दोनों तटों पर लगभग 500 मीटर तक हरित पट्टी विकसित कर बड़े स्तर पर वृक्षारोपण किया जाए और तटवर्ती क्षेत्रों में जैव विविधता संरक्षण हेतु हरित क्षेत्र तथा बायोडायवर्सिटी पार्क विकसित किए जाएँ।
यमुना के पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के लिए डीजल चालित नावों के स्थान पर पारंपरिक नावों के उपयोग को भी प्रोत्साहित किया जा सकता है।
यमुना संरक्षण को जन आंदोलन का स्वरूप देने के लिए तटवर्ती ग्राम पंचायतों को विशेष कार्ययोजना तैयार करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए तथा जल सहेलियों को औपचारिक रूप से इस अभियान से जोड़ा जाए। विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में यमुना संरक्षण समितियों का गठन कर नियमित जनजागरूकता और स्वच्छता कार्यक्रम आयोजित किए जाएँ।
धार्मिक और सांस्कृतिक स्थलों के माध्यम से जनजागरूकता अभियान चलाए जाएँ तथा जिला स्तर पर बहु-हितधारक समिति बनाकर संरक्षण गतिविधियों की निगरानी की जाए।
यमुना पर अध्ययन, अनुसंधान और नीति निर्माण को बढ़ावा देने के लिए आगरा में “यमुना रिसर्च सेंटर” की स्थापना की जाए तथा जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक जल प्रबंधन रणनीति तैयार की जाए।
राज्य स्तर पर “यमुना संरक्षण मिशन” की स्थापना पर भी विचार किया जा सकता है। लगभग 500 किलोमीटर लंबी इस यात्रा में कुल 46,23,356 रुपये का खर्च आया। यह राशि न तो सरकार से मिली और न ही किसी बाहरी संस्था से, बल्कि इसे जल सहेलियों और जल सहेली संगठन समाज के सहयोग से पूरा किया।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह भी बताया गया कि यह यात्रा केवल एक शुरुआत है। आगे भी नदी संरक्षण, जल स्रोतों के पुनर्जीवन और समुदाय आधारित जल प्रबंधन के लिए लगातार अभियान चलाए जाएंगे। जल सहेलियाँ समाज, सरकार और विभिन्न संगठनों के साथ मिलकर यमुना नदी को अविरल और निर्मल बनाने के लिए निरंतर प्रयास करती रहेंगी।
इस यात्रा में सक्रिय रूप से भाग लेने वाली प्रमुख जल सहेलियों में गायत्री, माया, सुधा, सीता, रेखा, पुष्पा कुशवाहा राष्ट्रीय अध्यक्ष जल सहेली समिति सहित बुंदेलखंड क्षेत्र की अनेक जल सहेलियाँ शामिल रहीं, जिन्होंने इस यात्रा को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।इस अवसर पर संस्था के एग्जीक्यूटिव वरूण प्रताप सिंह तथा शिव मंगल सिंह प्रमुख रुप से मौजूद थे।
