झांसी। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय के पंडित दीनदयाल उपाध्याय शोधपीठ द्वारा “भारतीय ज्ञान परंपरा में इतिहास एवं पुरातत्व” विषय पर एक विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में विषय विशेषज्ञों ने भारतीय इतिहास और पुरातत्व की समृद्ध परंपरा तथा उसके वैश्विक महत्व पर विस्तृत प्रकाश डाला।

मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित प्रो. अवनीश कुमार मिश्रा (इतिहास विभाग, SMC विश्वविद्यालय, लखनऊ) ने अपने संबोधन में कहा कि भारतीय इतिहास की व्याख्या को स्वदेशी दृष्टिकोण से समझना समय की आवश्यकता है। उन्होंने पुरातात्विक साक्ष्यों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि ये हमारे अतीत की प्रामाणिकता को सिद्ध करते हैं और नई शोध संभावनाओं के द्वार खोलते हैं।

मुख्य वक्ता प्रो. महेंद्र उपाध्याय (जगत गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग राज्य विश्वविद्यालय, चित्रकूट) ने भारतीय ज्ञान परंपरा की व्यापकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि भारत का इतिहास केवल घटनाओं का विवरण नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों और दर्शन का प्रतिबिंब है। उन्होंने पुरातत्व के क्षेत्र में हो रहे नवीन शोधों और उनकी उपयोगिता पर भी विस्तार से चर्चा की।
कार्यक्रम के अध्यक्ष प्रो. देवेश निगम (अधिष्ठाता, वाणिज्य संकाय) ने अपने उद्बोधन में कहा कि ऐसे व्याख्यान शैक्षणिक वातावरण को समृद्ध करते हैं और विद्यार्थियों में शोध के प्रति रुचि उत्पन्न करते हैं। उन्होंने सभी वक्ताओं एवं प्रतिभागियों का आभार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम की सफलता के लिए आयोजकों की सराहना की। कार्यक्रम के आयोजक निदेशक प्रो. मुन्ना तिवारी ने अपने स्वागत उद्बोधन में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत का अध्ययन नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए मार्गदर्शक है। उन्होंने बताया कि इतिहास एवं पुरातत्व के माध्यम से हम अपनी सांस्कृतिक जड़ों को समझ सकते हैं और नई पीढ़ी को उससे जोड़ सकते हैं।
कार्यक्रम में डॉ आशीष दीक्षित, डॉ राघवेन्द्र द्विवेदी, डॉ रामनरेश देहुलिया, डॉ पूजा निरंजन, डॉ रेणु शर्मा, डॉ गरिमा, ऋचा सेंगर, कपिल शर्मा, आशुतोष शर्मा, जोगेंद्र कुमार, आकांक्षा सिंह व छात्र छात्राएं उपस्थित रहे।
