जन्मदिन पर विशेष:-
पृथक बुंदेलखंड राज्य का सपना आज भले ही अधूरा हो, लेकिन इस सपने को जनांदोलन का रूप देने वाले पुरोधा स्वर्गीय शंकरलाल मेहरोत्रा को इतिहास कभी भुला नहीं सकता। 09 मार्च 1948 को झांसी के एक प्रतिष्ठित कारोबारी परिवार में जन्मे शंकरलाल मेहरोत्रा ने सुख-सुविधा और समृद्धि से भरे जीवन को त्यागकर संघर्ष और आंदोलन का मार्ग चुना। 22 नवंबर 2001 को वे इस संसार से विदा हो गए, किंतु उनका विचार, उनका संघर्ष और उनका संकल्प आज भी बुंदेलखंड की चेतना में जीवित है।

पृथक बुंदेलखंड राज्य आंदोलन को संगठित रूप देने का श्रेय शंकरलाल मेहरोत्रा को जाता है। 17 सितंबर 1989 को मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर स्थित धवर्रा से उन्होंने बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना कर आंदोलन की औपचारिक शुरुआत की। इसके बाद दिसंबर 1989 में झांसी में एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के अनेक सामाजिक और राजनीतिक संगठनों ने भाग लिया। यद्यपि इससे पहले भी क्षेत्र के कुछ नेता पृथक राज्य की मांग उठाते रहे थे, लेकिन वह आवाज सीमित दायरे तक ही थी। शंकरलाल मेहरोत्रा ने पहली बार इस मांग को संगठित कर जन-जन तक पहुंचाने का कार्य किया।

आंदोलन के दौरान आर्थिक संकट भी सामने आया, लेकिन शंकरलाल मेहरोत्रा ने इसे अपने संकल्प के आड़े नहीं आने दिया। उन्होंने नौगांव स्थित अपनी डिस्टिलरी फैक्ट्री तक बेच दी और कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा देकर स्वयं को पूर्णतः आंदोलन को समर्पित कर दिया। यह त्याग इस बात का प्रमाण था कि उनके लिए बुंदेलखंड केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न था।
25 अप्रैल 1993 को पूरे बुंदेलखंड में “टीवी प्रसारण रोको आंदोलन” चलाया गया। आंदोलनकारियों ने विभिन्न जिलों के टीवी रिले केंद्रों पर प्रदर्शन किया। झांसी किले स्थित टीवी सेंटर पर हुआ आंदोलन विशेष रूप से ऐतिहासिक साबित हुआ। सैकड़ों कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया, लेकिन इसके बाद भी आंदोलन का जनसमर्थन लगातार बढ़ता गया और बुंदेलखंड की मांग घर-घर तक पहुंच गई।
आंदोलन की गूंज संसद और विधानसभा तक भी पहुंची। 1994 में मध्यप्रदेश विधानसभा और 1995 में लोकसभा में पर्चे फेंककर पृथक बुंदेलखंड की मांग राष्ट्रीय स्तर पर उठाई गई। उस समय केंद्र में प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिंह राव की सरकार थी और आंदोलनकारियों को गिरफ्तार भी किया गया। बाद में लोकसभा में विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी के हस्तक्षेप से उन्हें रिहाई मिली। इससे यह स्पष्ट हो गया कि बुंदेलखंड की मांग अब राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बन चुकी है।

जनवरी 1996 में झांसी किले के मैदान में देशभर के छोटे राज्यों की मांग करने वाले संगठनों का एक विशाल सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें शिबु सोरेन, अजीत सिंह और इंद्रमणि बडोनी सहित कई प्रमुख नेता शामिल हुए। इसी सम्मेलन में “नेशनल फ्रंट फॉर स्मॉलर स्टेट्स” का गठन किया गया, जिसकी जिम्मेदारी शिबु सोरेन और शंकरलाल मेहरोत्रा को सौंपी गई।
सन 2000 में उत्तराखंड, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे नए राज्य तो बने, लेकिन बुंदेलखंड की मांग अधूरी रह गई। यह पीड़ा शंकरलाल मेहरोत्रा को भीतर तक व्यथित कर गई। 22 नवंबर 2001 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया, किंतु उनका संघर्ष और विचार आज भी बुंदेलखंड आंदोलन को प्रेरणा देते हैं।
आज भी बुंदेलखंड राज्य की मांग जिस रूप में जीवित और सशक्त है, उसकी नींव शंकरलाल मेहरोत्रा के तप, त्याग और संघर्ष में ही निहित है। उनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए बुंदेलखंड राष्ट्र समिति के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रवीण पांडेय के नेतृत्व में विगत वर्षों से बुंदेलखंड राज्य निर्माण के लिए अब तक 51 बार खून से खत, जंतर मंतर में राज्य निर्माण हेतु सत्याग्रह,विभिन्न जनजागरण अभियान, यात्राएं, सम्मेलन और आंदोलन चलाए जा रहे हैं। गांव-गांव,जनसंपर्क, कार्यकर्ता प्रशिक्षण, संकल्प सभाओं और व्यापक जनसंवाद के माध्यम से क्षेत्र की जनता को एकजुट करने का प्रयास लगातार जारी है।

बुंदेलखंड राष्ट्र समिति द्वारा हर वर्ष 09 मार्च को शंकरलाल मेहरोत्रा की जयंती “बुंदेलखंड संकल्प दिवस” के रूप में मनाई जाती है। फतेहपुर सहित पूरे बुंदेलखंड क्षेत्र में इस दिन उनके संघर्ष को स्मरण करते हुए पृथक बुंदेलखंड राज्य के लिए संकल्प दोहराया जाता है। इस वर्ष भी संगठन द्वारा विभिन्न जिलों में कार्यक्रम आयोजित कर उनके विचारों को जन-जन तक पहुंचाने की तैयारी की जा रही है।
शंकरलाल मेहरोत्रा का जीवन इस बात का प्रतीक है कि किसी क्षेत्र की अस्मिता और अधिकार के लिए किया गया संघर्ष कभी व्यर्थ नहीं जाता। उनका नाम बुंदेलखंड आंदोलन के इतिहास में सदैव सम्मान और प्रेरणा के साथ लिया जाता रहेगा।
